Saturday, June 2

"बदलते रिश्ते "-01 जून 2018


विषय: बदलते रिश्ते 

आज फिर वो अपने राहो मे मिले थे। 

हमारे बड़े होने से क्या बदलते है रिश्ते। 
वो जो सदैव साथ हर पथ पर थे ।
मेरे स्वरों को सुनने को विचलित थे रिश्ते। 
ज़िन्दगी के उतार चढ़ाव के पड़ाव मे
कहीं पीछे छुट गये थे।
जाना बहुत जरुरी है वो सब ही रिश्ते।
आज फिर वो अपने राहो मे मिले थे।

फिर से रिश्तो की कड़वाहट मिटानी है। 
संवारना होगा इन्हें पहले की ही तरह।
किसी भी कीमत पर खोने नहीं देना है। 
साथ ले कर चलना है पहले की तरह।
यही तो हमारी एकता का प्रतीक है।
स्वाति करती है नमन सब को उसी तरह।
क्योंकि यू ही नहीं बदलते रिश्ते।
क्योंकि यू ही नहीं बदलते रिश्ते।


 प्रस्तुति 01

01 जून 2018


" बदलते रिश्ते "

रिश्ते तो सदा ही वक्त के साथ बदलते रहते हैं

जो कभी दोस्त थे वो कभी दुश्मन भी बनते हैं

ये तो हालातों की मज़बूरी है या फिर किस्मत की

सारे रिश्ते ताज़िन्दगी एक से कभी नहीं रहते हैं

(स्वरचित)


डॉ स्वाति श्रीवास्तव



बदलते रिश्ते"
इस बदलती दुनियाँ में रिश्ते बदलते देखे हैं,

दिल के सारे अहसास बदलते देखे हैं,
जो बच्चें माँ का आँचल कभी ना छोड़ते थे,
आज वो उनको वृद्धाश्रम छोड़ते देखे हैं,
नये रिश्तों की खातिर पुराने रिश्ते भूले,
भूल माँ के प्यार को नये जज्बात जगाते देखे हैं,
पकड़ अँगुली पापा की जब चलना सिखा था,
आज उनको कर्तव्य से अपने मुँह मोड़ते देखा है,
हर त्योहार पर देती थी नये कपड़ों का उपहार,
आज उसी माँ को फटी साड़ी में लिपटे देखा है,
वक्त मिलना था जो माँ-बाप को,
वो वक्त मोबाइल पर गुजरते देखा है,
देख हर तरफ यही व्यवहार यही मैं कहती हूँ,
बढ़ते जिदंगी के सफर में रिश्तों को बदलते देखा है।
स्वरचित-रेखा रविदत्त
1/6/18
शुक्रवार



 ''बदलते रिश्ते"

तरक्की के दौर ने , कुछ यूँ हमें ठगा ।

चंद रिश्तों को निभाना , अब बोझ सा लगा ।।

हम बढ़ रहे किधर को , ये पता न चल सका ।
हर एक स्वर अलापा , हर एक है थका ।।

परिवार ही समाज की , शोभा सदा बढ़ाये ।
परिवार को कुचलकर , झण्डा हैं हम सजाये ।।

ये कौन सी तरक्की , ये कौन सा सिला ।
दो रिश्ते ही बचे जो , उनमें ही है गिला ।।

मानवीय मूल्यों की , अब नही कदर ।
हर रिस्तों में दिखे है , आज अब गदर ।।

सोने की चिड़िया यूँ न , कहाये ये देश ।
दुनिया को सभ्यता का , देता रहा उपदेश ।।

सोचो न होंगे रिश्ते तो क्या होगा भेष ।
जानिये ''शिवम" अब भी है , समय शेष ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"



रिश्ते अपनी जगह पर हे
बदलते नही रिश्ते पर हे


माॅ हो भाई,पिता,पत्नि
किरदार बदलते पर हे

मजबूरियाँ हे हमारी यारो
निभाते सब रिश्ते पर हे

आंसू छिपा कर यारो
मुस्कुराते हम सब पर हे

रूपयो की धूरी पर रिश्ते हे
इलज़ाम लगाते सब पर हे

मीठे रह कर मुस्कराते 'मोहन,
बनाम रिश्तो के बदनाम करते सब पर हे

स्वरचित /मौलिक रचना
मनमोहन पालीवाल
काव्यगोष्ठी मंच
कांकरोली 

01-06-2018


आज का विषय बेहद ही खूबसूरत और दिल को छूता हुआ है.....इस विषय पर मेरी ये रचना---" रिश्तो का व्याकरण" 
मैं कुछ गीत लिखूं या छंद लिखूं,
व्यथित हदय में छपी वो छाप लिखूं,

रिश्तों के दरवाजों पर दस्तक देती,
समय की ताकत का हाल लिखूं!!!

कल गुजर पङी थी कुछ गलियों से
अपने रिश्ते नातों पर यूं दंभ लिये,
दिल की उम्मीदों का व्याकरण
और सहानूभूति का अनुबंध लिये।
फिर, खाली हाथ रही मेरी मुटठी
अपने अपनों पर अचम्भ लिये........
अब़...................
मैं खुद से खुद का विश्वास लिखूं
भरमाते रिश्तों पे क्या आस लिखूं
मानवता पर ग्रहण से, पानी पानी होते 
अर्थहीन सम्बन्धों पर क्यूं खास लिखूं।

कुछ साथी राह में मिल गये बोले,
क्यूं कुठंन, घुटन, निराशा, क्या है व्यथा,
संघर्ष ही जीवन का सार, बाकी मिथ्या,
सीपों के ढेर में से मोती चुन ले वही वृथा
मुफलिसी में जो वक्त पे काम आये
वही है दिल का सच्चा और सखा........
अब़...................
दिल की पैरहन पर कुछ अरदास लिखूं
रूहानी रिश्तों पर सूफियाना कलाम लिखूं
धूप की दिवारों और चांदनी की छतों पे
हौसलों के चुभते नश्तर की प्यास लिखूं

कैसे ?? रिश्तों के दरवाजे पर दस्तक देती?
समय की ताकत का हाल लिखूं!!!
-------- डा. निशा माथुर/8952874359



शीर्षक: बदलते रिश्ते

वक्त बदल रहा है

व्यवहार बदल रहा है
रिश्तों में कर्त्तव्य का
परिवेश बदल रहा है

विचार बदल रहे हैं
अरमान बदल रहे हैं
ख्वाहिशों की चाह में 
रिश्ते बदल रहे हैं

मौसम बदल रहा है
हवा बदल रही है
इंसानी रिश्तों की
परिभाषा बदल रही है

तृष्णा के बादल
रंग बदल रहे है
प्रतिस्पर्धा की दौड़ में
जगह बदल रहें हैं

बूढ़े वृक्ष दर्द से
आश्रय बदल रहें हैं
भविष्य के उजाले
करवट बदल रहे हैं

दौलत का सूरज सर चढ़कर
आग उगल रहा है
अहंकार की तपन से
रिश्ते निगल रहा है

स्वार्थ का दानव 
अपने पांव जमा रहा है
चेतना को खाकर
अपनी भूख मिटा रहा हैं

ईष्या द्वेष सब को
आखें दिखा रहा है
रिश्ता कोने में दुबका
आंसू बहा रहा है

इंसानी फितरत 
गिरगिट हो गई है
उम्मीद सर झुकाए
रिश्तों की लाश ढो रही है

आचार अपना बदलो
आधार इसको समझो
रिश्तों की पूंजी को
जतन कर संभालो

आस अपनी बदलो
प्यास अपनी बदलो
बदलते रिश्तों में
सर्मपण की सांस भर दो

स्वरचित : मिलन जैन
दिनांक : ०१ जून २०१८



भावों के मोती 01-06-2018
"बदलते रिश्ते "
नाजुक परी थी घर की 

घर वही अब पराई हुई 
जिन गलियों में बचपन बीता 
गलियां वही पराई हुई 
चाँद तारों को देखा करती 
अंगना वो भी पराई हुई 
सखियाँ भी पराई हुई 
जिस दिन बेटी की विदाई हुई
जिस खूंटे से बान्धी गई 
अटकी वहीं रह गई 
रिश्ते बदलते नहीं अपनों की
बदली गुड़िया की कहानी हुई 

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल



कहीं प्रेम और त्याग मिल कर सींचते रिश्ते
कहीं गलतफहमियों की चोट से दरकते रिश्ते 
कहीं अपनेपन की खूशबू से महकते रिश्ते

कहीं निजी स्वार्थ की ओट में सरकते रिश्ते
कहीं दर्द को छुपा हँसी बिखेरते रिश्ते
कहीं मुखौटे लगाकर दर्द परोसते रिश्ते
कहीं अपने खून से भी बढ़ कर निभते रिश्ते
कहीं नासूर बन जिंदगी पर रिसते रिश्ते
कहीं जन्मों के प्रेम बंधन दिखते रिश्ते
कहीं मौसम की तरह बदलते रिश्ते

ऋतुराज दवे



 बदलते रिश्ते
रह नहीं गये अब पहले जैसे रिश्ते ।
गरम नहीं हैं अब खून के भी रिश्ते।।

मतलब के लिये बनाये जाते है रिश्ते।
रह गये है अब महज मतलब रिश्ते ।।
बूढ़े माँ बाप का वृध्दाश्रम को पठाते ।
मतलब के लिये गधे के बाप बनाते ।।
बड़े आदमी को अपना रिश्तेदार बताते ।
सगे रिश्तेदार से अपने है आँखे चुराते।।
बहुत कम जो आजकल रिश्ते निभाते ।
मतलब के लिये है वह बदलते रिश्ते ।। 
डा0 सुरेन्द्र सिंह यादव
“व्यथित हृदय मुरादाबादी” 
स्वरचित

Thursday, May 31

"बचपन से पचपन "-31 मई 2018



Vipin GoelVipin and 85 others joined "भावों के मोती" within the last two weeks. Give them a warm welcome to your community!
 Vipin and 85 others joined "भावों के मोती" within the last two weeks. Give them a warm welcome to your community! 

""""शीर्षक -बचपन से पचपन"""""
बचपन से पचपन तक का सफर था बड़ा न्यारा
जवानी की अमीरी से गरीब बचपन था बड़ा प्यार।।

ना ईर्ष्या थी ना चिंता थी न जिम्मेदारी का साया था
खाली जेब टूटे बटन गंदे कपड़ो में सब कुछ पाया था
ना जाति पाति का बंधन था ना ही धर्मो की बेड़ी थी।
ना फरारी थी ना सफारी थी बस एक लकड़ी की रेहड़ी थी।
ना पसंद दिल्ली है ना बम्बई और सूरत है।।
बस एक बार फिर उस गरीब बचपन की जरूरत है।।
"""""स्वरचित- विपिन प्रधान"""""



 बचपन से बुढापे तक
खुदघिर गया है 
ना जाने अपनी चाहतों

में कहाॅ खो गया 
अपने ही बिछाये जाल में
कैद हो गया है इन्सान
पाप बोझ की गठरी से
लद गया है इन्सान
बचपन से पचपन का
हो गया है बुरा इन्सान
स्वरचित एस डी शर्मा



बचपन से पचपन तक
🔏🔏🔏🔏🔏🔏

यह स
रिता से सागर जैसी यात्रा थी
आरम्भ में अध्यात्म की एक कुशल पात्रा थी
उम्र के बहाव चढ़ते रहे
इसमें रिसाव बढ़ते रहे। 

यह भी गंगा की तरह गंदी होती रही
ईश्वर की ओर इसकी गति मंदी होती रही
बचपन की वह निश्छल मुस्कान 
कुटिलता की ही बन्दी होती रही। 

बचपन की निर्मलता को छद्म लूट गया
भोलेपन से तारतम्य सारा छूट गया
जीवन के इस विचित्र प्रवाह में
मन का आनन्द रुठ गया।

इधर उधर के विचार नृत्य करते थे
अपने स्वार्थ साधने के कृत्य करते थे
भोले भाव मिले रघुराई भूल गये
हालाकि यह रोज़ पढ़ा करते थे।

सरिता तो पा लेती सागर
किन्तु मेरे पास रही गन्दी गागर
अब किस मुंह से कहूॅ दे दो दर्शन
ओ नियति के सुन्दर नट नागर।

भा.31/5/2018(गुरुवार )शीर्षक, बचपन से पचपन ःविधाःःकविताः
बचपन कोमल निर्मल निश्छल मन,
समता से भरा प्रेम सागर।

बाल्यावस्था शैशवावस्था पारकर
किशोरावस्था का अनूठा सागर।
समझदार लगने लगा जब सिर पै धरी यौवनावस्था की गागर।
जिम्मेदारियां बढने लगी धीरे धीरे,
शादीशुदा हुऐ जब सभी हम।
बच्चे हुए फिर इनका लालन पालन
दबने लगे बोझ तले सभी हम।
बढने लगी बच्चों की पढाई लिखाई,
भूल गए सब मस्ती और बचपन।
जिंन्दगी के मायाजाल में फंसकर,
पहुंचे अभी हम उम्र पारकर पचपन।
अब शरीर में वो शक्ति रही न
नहीं रहा वो प्यारा सा बचपन।
याद आता है हमेशा याद आता रहेगा
हमको सदा ही सुहाना बचपन।
ता उम्र नहीं भूल सकते हम शायद ,
कभी खेले कूदे वो दिन लडकपन।
देह शिथिल पड गई हमारी।
आफत बनी कुछ नई बीमारी।
वैसै भी चंद दिनों के मेहमान हम,
जिंन्दगी जीना बन गई लाचारी।
फिर से हमारा जीवन बचपन बन गया है।
रूठना मनाना हमारा शगल बन गया है।
बच्चों बहुओं की शायद मुशीबत बने हम,
ये पचपन का जीवन बचपन बन गया है।
स्वरचितः
इंजी शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म .प्र.
जय जय श्री राम राम जी।



बचपन से पचपन

एक अरसा बीत गया

बचपन से रुबरु हुए
दर्पण के समक्ष बैठी हूं
पचपन की दहलीज़ पे

जीवन के बहते सफर में
कब बचपन जिया था
श्वेत टेसू लगाए गेसू में
वो लम्हें खोज रही हूं

सुन्दर निश्चल निश्चिंत
बचपन कब जी पाई थी मैं
रिश्तों की कड़वाहट से
सहमती आई थी मैं

यौवन बेला में पिया संग
खिलखिलाइ थी मैं
मासूम बचपन जाने कहां
छोड़ आई थी मैं

आज खुश थी मैं
बचपन ठहर गया था
जब आंचल में मेरी
मेरा अक्स खिल गया था

जीवन के झंझावतों से
जिन्दगी आम हो गई थी
दायित्वों को पूरा करते करते
शाम हो गई थी

बीते लम्हों की उहापोह
कहां खींच लाई थी 
दर्पण में दिखी आंगन
की किलकारी लौट आई थी

निःस्वार्थ निष्कलंक निश्चिंत
बचपन खेल रहा था
पोतों के खिलौनों को
मेरा बचपन जी रहा था

दिल बच्चा हो गया है
आज सन्तुष्ट हूं गुदगुदा रही हूं
पचपन में बचपन का
आनन्द उठा रही हूं

स्वरचित : मिलन जैन
दिनांक: ३१ मई २०१८

भावों के मोती
31-5-2018
बचपन से पचपन


पचपन में भी बचपन रखिये
जवां सदा मन खुद में रखिये।

माना तन है थका थका
मन से खुद को नौंजवां रखिये।

बचपन से पचपन है आया
हर दौरे लुत्फ उठाते रहिये।

खट्टी मीठी बातों की गठरी 
अंत समय तक साथ है रखिये।

न देखें क्या छूट गया है
हाथ जो आया ,संभाले रखिये।

बचपन से पचपन कठिन चढ़ाई 
हौसले बुलंद चढ़ने के रखिये।

वीणा शर्मा

 बचपन से पचपन तक, क्या बदलता गया 
मन के कोने में रहा बच्चा, तन ढलता गयाl


छोटी छोटी ख़ुशी को,वक्त सहेजता गया 
यादें समेटे हर उम्र की , सफर चलता गयाl

वक्त की आँधी में बचपन, धूल बन उड़ता गया 
जिम्मेदारी बोझ पचपन तक, कर्ज सा चढ़ता गयाl

बच्चों की आँखों में, अपना बचपन ढूँढता गया 
कर्म की राह चलते हुए,उनके स्वप्नों को बुनता गयाl

ऋतुराज दवे


 प्रस्तुति 02

31 मई 2018


"बचपन से पचपन "

बचपन बहुत नादान और भोला होता है

पर तीक्ष्ण बुद्धि और चुस्ती फुर्ती का स्वामी होता है

यदि पचपन रहेगा और खेलेगा
बचपन के सँग

हँसी खुशी के साथ उत्तम मनोरंजन होता है

सब पचपन वालों को चाहिये खेलें बचपन के सँग

और जीवन में पायें खुशियाँ और भरपूर उमँग

(स्वरचित)

शीर्षक - बचपन से पचपन तक
भावों के मोती
कवि जसवंत लाल खटीक

( स्वरचित )

बचपन बड़े , नाज़ो से बीता ,
माँ-बापू के , लाड़-प्यार में ।
सबका , राजदुलारा था , 
मेरे प्यारे से , बचपन में ।।

पाँच बरस तक ,मौज मस्ती ,
बात- बात पर , सबसे झगड़ता ।
भाई- बहनों का , लाडला ,
मन ही मन , मै ,खूब अकड़ता ।।

दस बरस में , पढ़ाई करने ,
शहर मुझको ,भेज दिया ।
परिजनों , का साथ छुटा ,
तन्हा मै , अब रह गया ।।

बीस बरस में , आते-आते ,
नोकरी मुझको , मिल गयी ।
इक्कीस में , मेरी शादी हुयी ,
सपनो की रानी , मिल गयी ।।

पच्चीस बरस , में मुझको ,
बाप , बनने का , सौभाग्य मिला ।
बेटी और बेटे , को पाकर ,
जीवन का , आनन्द मिला ।।


तीस से पैंतीस , बरस में ,
जिम्मेदारी , का बोझ बढ़ा ।
बच्चों की शिक्षा , के साथ ,
जीवन में और , जोश बढ़ा ।।

चालीस बरस , में आते-आते ,
बालो में , सफेदी आयी ।
रिश्ते नाते , निभाते-निभाते ,
जिंदगी , थोड़ी सी मुस्करायी ।।

जिंदगी के , अर्धशतक में ,
बच्चों की शादी, की चिंता ।
शौक मौज से ,शादी करवाके ,
बहुत ही खुश , हुआ मै , पिता ।।

बचपन से पचपन , तक, "जसवंत ",
जिंदगी को , जी भरके जिया ।
मोह माया , सब कुछ त्याग कर ,
प्रभु ! की भक्ति , में तन-मन दिया ।



"बचपन से पचपन"
सपने सजोते नई उमंगे नई कहानी 
अच्छी लगती चाँद तारों की कहानी 

नानी और दादी की ही जुबानी

गुजरते पल चढ़ती जवानी 
खाबों को सच करने की कहानी 
कर्मों से जुड़ने मौज़ों की रवानी

सूरज चढ़ता रहा दिन ढलता रहा 
साथ साथ सुख दुःख जीता रहा
रिश्ते नाते मिलते और बिछुड़ते रहे 

गुजरते पल झलकते पलकों पर
बिखरते सपने अधूरी कहानी 
ढलती जवानी धूमिल कहानी 
है पचपन की बातें पूरानी

सुबह से शाम तक का पहर
है बचपन से पचपन का सफर
सबकी है यही राम कहानी

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

"अंदाज"05मई2020

ब्लॉग की रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं बिना लेखक की स्वीकृति के रचना को कहीं भी साझा नही करें   ब्लॉग संख्या :-727 Hari S...