Tuesday, May 29

"समर्पण "-29 मई 2018


कहीं समर्पण अब न दिखता
चंद पैसों में इंसा बिकता ।।

डांवाडोल है मन की सुई
बड़ी बिडम्बना अब ये हुई ।।

कैसे टिके रिश्तों की जड़ 
देर सबेर जाती उखड़ ।।

कुर्सी से न सही जुड़ाव 
सबको ही है आज अभाव ।।

मानव मूल्य खतम हुये 
मानवता पर सितम हुये ।।

जीवन का सच्चा आनन्द
क्या लिखूँ अब उस पर छंद ।।

गायब ही है आज ''शिवम"
आँखें भी हो रहीं हैं नम ।।

रोको कुछ जो रूकें कदम 
वरना अन्तिम पडा़व पर हम ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"


है समर्पण दिल में मेरे
कभी न किसी का अहित करूं
सहज रुप से ध्यान धरूं मैं
मन में समर्पण भाव रखूं

ऊंच नींच का भेद हटाऊं
मन में समता भाव धरुँ
निर्बल निरीह का कष्ट हरूं मैं
सच्चा समर्पण भाव रखूं

मात पिता की सेवा करूं मैं
मातृभूमि सम्मान करूं
हैं समर्पण भाव दिल में
सम्पूर्ण जीव जगत कल्याण करूं

हदय समर्पित लक्ष्य समर्पित
दृढ़ता का आगार करूं
जीवन का हर क्षण समर्पित 
अर्पित अपने प्राण करूं

स्वरचित मिलन जैन


 "भावों के मोती "
29/5/18


समर्पण 
----------

चाहिए समर्पण किसी का
तो ,रखिए ता का मान 
प्रेम, त्याग और सत्य से 
कीजिए पूर्ण सम्मान 
रत्न से भी अनमोल है 
जिसके मन ये भाव
उसके सम्मुख क्षीण हो 
दिनकर का प्रभाव 
मिल जाये जो जीवन में 
ऐसा साथ एक बार 
कुरूक्षेत्र के व्यूह से 
जानिए बेड़ा पार 
ऐसे पावन रूप पर 
तन मन धन सब अर्पण 
दो क्षण को ही दीजिये 
नाथ पूर्ण समर्पण ।


समर्पण
नही बात अब अर्पण,तर्पण,समर्पण की,
बात अब है मात्र तेरे मेरे विश्वास की।।

न छिन्न भिन्न उसे होने देना चाहती हूं
अपने ही हाथों से उसे सँवारना चाहती हूँ।।

विश्वास के धरातल पर कर समर्पण,
खिला खिला हो आँगन,सत्यता का दर्पण।।

चेहरे पर मुस्कान हो,हृदय में हो स्पंदन,
तेरे आते ही महकता हो मन मेरा चंदन।।

पूंजी सदा विश्वास की मुझे समर्पण करना,
बेशक हो सूखी रोटी,अमृत्व समर्पण रखना।।

राह अनजानी साथ चली मैं कोसो दूर,
उस अनजान सफर में ऋतु वसंती भरना।

वीणा शर्मा


आज के विषय "समर्पण" पर मेरी ये कविता आप सबकी नजर...जिसमे नायिका का समर्पण प्राण निमंत्रण के माध्यम से प्राण निमंत्रण

चाँद तू कुछ और निखर, अपनी चंद्रिका पे इनायत कर,

उर बीच पनार के छालों को, हाथों पे सजाकर रक्खा है।

प्राण का फागुन खिल रहा, मेरी सांसों में धुंआ धुंआ सा, 
प्रीत की बासंती हवाओं को , खिड़कियो पे बुला रक्खा है।

गुनकी महकी यादें संजोयी है, किताबों में अब मुरछाने को
गुलाब तू भी हंस के देख ले, पत्ता पत्ता बिखरा रक्खा है।

अरे पावस के पहले बादल ,उमङ घुमङ घिर के बरस जरा
अंतस की तृष्णा को, बारिश की बेखुदी ने तरसा रक्खा है।

बर्फ के धुऐं पे बना रही हूं हौले से आशियाँ कुछ ख्वाबों का
मेरे ही शे के सदके जाऊं मैने एक शहर भी बसा रक्खा है।

तेरे कदमों में हो तो जाऊं निछावर इन गुलाबी फूलों सी ,
खाक में मिलके भी तेरे लिये खुशबू को बचा कर रक्खा है।

घटाओं पे हया की बंदिश है,झट से चाक कलेजा कर देंगी,
इन जुल्फों की शोखी को हौले से भी तो संभाले रक्खा है।

झौंका हवाओं का उन्मन नाच रहा,लेकर सुधियां साजन की,
घूंघट में अपने चुपके से वो आधा चांद छुपा के रक्खा है।

मैं, लतर सलोनी क्यूं नी भीगूं, मधुबन के तरूवर से मिलकर 
चांद चांदनी की मदिरा में इस निशा को भरमा के रक्खा है।

अब चंचल मंदाकिनी उतर रही है चुरा के मेरी चितवन को,
प्रियवर! मिलन यामिनी का तुम्हैं प्राण निमंत्रण दे रक्खा है।

डा. निशा माथुर- जयपुर ( राजस्थान)
8952874359




 "समर्पण"
हे प्रभु। समर्पण देख लो मेरा।
न करूं दिन -रात तेरी पूजा।

ना करूँ दान-धर्म का आडम्बर।
मैं तो समर्पित दायित्वों के प्रति।
हे प्रभु समर्पण देख लो मेरा
न करूं मैं तीर्थ-यात्रा।
न करूं व्रत ओ त्योहार।
मैं करूँ दीनन की सेवा।
हे प्रभु समर्पण देख लो मेरा।
थोड़ी भक्ति, थोड़ी मस्ती,
थोड़ी करूँ मैं समाज सेवा।
अरज करूँ मैं, विनती करूँ मैं।
हे प्रभु समर्पण देख लो मेरा।
स्वरचित -आरती श्रीवास्तव।


भा.29/5/2018( मंगलवार)शीर्षक, समर्पण
विधाःकविताःः
ये तन समर्पण मन समर्पण।

है प्रभु तुम्हें जीवन समर्पण।
जो कुछ मिला मुझे जगत से
वह सभी कुछ तुम्हें समर्पण।
तुम्ही से मिला है मुझे ये जीवन।
सबकुछ दिया है तुमने ये भगवन।
क्या लाया था मै साथ यहां पर,
जो कर पाऊँ मै सचमुच समर्पण।
प्रभु को समर्पित सारा ही जीवन।
जो मिला है इनसे इन्हें ही समर्पण।
सबकुछ मिला है मुझे इस वतन से,
वतन से मिला वो सब इसे समर्पण

 क्या कुछ मेरा जो कर पाऊँ अर्पण।
देख लिया मैने अंतरतम का दर्पण।
विनय करुँ बस भगवान मै इतनी,
विध्वंस नहीं मै करूँ शुभ सृजन।
प्रभु को मेरे श्रद्धा सुमन हैंअर्पण
मेरा सब इस वसुधा को समर्पण।
मिला मान सम्मान इस धरा से ,
जो भी मिला वो इसे ही समर्पण।
स्वरचितः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
जय जय श्री राम राम जी।

Monday, May 28

"अनमोल "-28मई 2018



 आँखों से गिरा था आँसू
जब उस बच्ची का।
पिता ने कहा ये आँसू नहीं

अनमोल मोती है 
मेरी बच्ची का।

स्कूल में डाँट पर बहा आँसू
पोंछा आँसू उसका।
सहेली ने कहा ये आँसू नहीं
अनमोल मोती है 
मेरी सखी का।

लड़ाई में जब आया आँसू
इस बहन का।
भाई बहन ने कहा ये आँसू नहीं
अनमोल मोती है 
हमारी बहन का।

विदाई पर फिर निकले आँसू
जब उस बेटी का।
माँ ने कहा ये आँसू नहीं
अनमोल मोती है 
मेरी बेटी का।

गिरा जब पहली बार आँसू
ससुराल के सबब का।
आवाज़ आई बहा ये आँसू
नमक का पानी है बहू इसका
बह जाना है अच्छा।

क्यों आज भी इतना अन्तर
रखता है ये आँसू।
परिभाषा भी बदली इसकी
रिश्तों की आड़ में
बेमेल अब ये आँसू।

डॉ स्वाति श्रीवास्तव


सारे रिश्ते हैं अनमोल
सबसे बोलो मीठे बोल,

आज प्रेम से सबसे मिल
समय पता कब जाए डोल।
मानुष रूप भाग्य से मिलता
रंग और रूप कहाँ है टिकता,
दो दिन का मिला है जीवन
प्रेम के सब दरवाजे खोल।
अनमोल प्रकृति, अनमोल वचन
अनमोल वृक्ष,अनमोल सृजन
अनमोल है ये सारे बंधन
है ये सारा जग अनमोल।
सर्वेश पाण्डेय
२८-०५-२०१८
स्वरचित


अनमोल
🔏🔏🔏

वा का नहीं है कोई मोल
लेकिन फिर भी यह अनमोल
इसी तरह फैला यदि प्रदूषण 
तो लड़खड़ा जायेंगे सबके बोल। 

शब्द निकालो तोल तोल
अच्छे नहीं हैं बिगड़े बोल
बन्द करो बजाने ढोल
इन बातों को करो न गोल। 

अच्छा वृक्षारोपण हो
उनका अच्छा पोषण हो
जो भी हुआ सम्भालना है
व्यर्थ क्यों दोषारोपण हो।

हवा हमारी सबकी प्राणवायु 
यह देती हमें एक दीर्घ आयु
हमारी वृक्ष सम्पदा हम बढ़ालें
स्वस्थ होंगे सबके स्नायु।


शीर्षक - अनमोल

आज कुछ लिखना चाहती हूं

दिल की बातो को शब्द देना चाहती हूँ
क्यों हो तुम अनमोल मेरे लिए 
ये सोचना चाहती हूँ

की है कोशिश पूरी 
दे सकू शब्द अपनी सोच को
रिश्ता है अनमोल हमारा 
दुःख सुख में लगता सहारा।

जो भी है सब कुछ 
निस्वार्थ निश्चल निभाते
बस ये ही कारण तुम मुझे हो भाते
मिस यू-२ बोलकर सब कुछ कह जाते।

ना तुम सिर्फ दोस्त हो 
ना हो कोई अलग रिश्ता से सम्मानित
लेकिन जो भी हो
बहुत खास हो मेरा विश्वास हो।

हर जगह तुम मेरा आत्मबल बढ़ाते
नही किसी से हूँ मै कम 
हमेशा मुझे अवगत करवाते
मुझ से ज्यादा भरोसा मुझ पर दिखलाते।

मेरी जीत का जसन 
अपनी जीत की तरह हो मनाते
मेरे लेखन में सूत्रधार हो तुम
मेरे अज़ीज बड़े कमाल हो तुम।

मेरी नजर में न-१ हो तुम
इसलिए मेरे जीवन का सार हो तुम
अच्छा-बुरा सही गलत सब तुमको ही बताना
तुमको सुनना और अपनी सुनाना ।

लोग दोस्ती से रिश्ता प्यार तक ले जाते
हम प्यार से भरपूर दोस्ती निभाते
सब कुछ है इस रिश्ते में 
प्यार, विश्वास, समर्पण इतना सब कुछ
हम तुम से ही पाते।

जितना बोलूं उतना कम है
इस दोस्त का एक ही वचन है
निभाएंगे ये रिश्ता पूरे हक और विश्वास से
चाहे फिर दूर रहे या पास रहे।

छवि गौतम।


 "अनमोल'।

जीवन के प्रत्येक क्षण है अनमोल।

न गंवाये इन्हें वरना दुनिया है गोल।

उतार चढाव तो आये जीवन में,
हमे क्या इनसे घबराना।
बीते क्षण न लौट पायेंगे।
समझे चतुर सयाना।

अनमोल हैं हमारी यादें,
जो जीवन में रच बस जाये।
कभी हँसे कभी सबक ले।
जो जीवन में काम आये।

अनमोल है हर एक रिश्ता।
जो जीवन बगीया महकाये।
इन रिश्तों के बिना ,
जीवन जिया न जाये।
अनमोल है शिक्षा।
अनमोल है संस्कार।
इन दोनो के अदभुत संयोग से
जीवन सफल हो जाये।

सोच है अनमोल
सही सोच रखें
जीवन सुखद हो जाये।
स्वरचित -आरती श्रीवास्तव।


भावों के मोती 
सोमवार 28/5/18


अनमोल 
------------

और भले ही कुछ भी भूलो
पर सुनो कान को खोल 
गांठ बांध कर सदा ही रखना 
चार बातें अनमोल 

हरा भरा न पेड़ कटाना 
चाहे कुछ हो जाए 
अगर बची न हरियाली 
तो सांस कठिन हो जाए 

साफ-सफाई का ध्यान रहे 
घर हो या चौबारा 
एक बार जो हाथ से निकली 
न सेहत मिली दोबारा 

व्यर्थ न फेंको इधर-उधर 
जितना चाहिए उतना लो 
धरती पर जीवन है जल से 
संरक्षण का प्रण लो 

प्रेम भाव से मिलकर रहना 
निकलें मीठे बोल 
गांठ बांध कर सदा ही रखना 
चार बातें अनमोल 

सपना सक्सेना 
ग्रेटर नोएडा


शीर्षक: अनमोल

है जीवन अनमोल रे प्राणी

समझ तू इसका मोल रे प्राणी

सुख दुख छांव आनी जानी
सुध बुध खोकर भागे प्राणी
आस निरास पीड़ा बेमानी
जीवन हार करे मनमानी
समझ तू इसका मोल रे प्राणी
है जीवन अनमोल रे प्राणी

माया रूप स्वरूप जवानी
हो उतावला भागे प्राणी
आंख पे पट्टी बना अज्ञानी
बना है जीवन चक्कर घाणी
समझ तू इसका मोल रे प्राणी
है जीवन अनमोल रे प्राणी

पाप की गठरी उतार रे प्राणी
मन संताप त्याग रे प्राणी
सत्य की राह बड़ी तूफानी
निर्भीक होंसले करे सलामी
समझ तू इसका मोल रे प्राणी
है जीवन अनमोल रे प्राणी

जीवन है उपहार रे प्राणी
कर अंगीकार हो रूमानी
ईश्वर की तू कर गुलामी
खिले गुलाब सी हो जिन्दगानी
समझ तू इसका मोल रे प्राणी
है जीवन अनमोल रे प्राणी

स्वरचित : मिलन जैन
दिनांक : २८ मई २०१८


28-5-2018
अनमोल
अनमोल है वो पन्ने,
जिसमे तुम्हारी लिखावट खिलखिलाती है,
दूर होकर भी वो,
पास होने का अहसास दिलाती है ।

ये कितना अनमोल रिश्ता है,
पन्नों से सरकता ,
दिल मे महकता है,
अनछुए जज्बातों को लिए,
दिल में मचलता है।

न ही इसमें सूरत है
न ही मधुर आवाज़ है,
अपने अनमोल रिश्ते में,
पन्ने ही तो सौगात है।

यही तो खास है,
दिन औ रात को चमकता,
यही मेरा सरताज है,
अनमोल पल,बिन पन्ने बेकार है।

वीणा शर्मा


किसे क्या अनमोल किसे क्या भाया है
हमें तो उनके नैनों ने ही उलझाया है ।।

काश अगर वो मिलते तो अच्छा होता
मगर न दिल किस्मत वो ऐसी पाया है ।।

जिसे ही बतलायी हमने ये दिल की बात
वो हँस कर के हमको ये समझाया है ।।

कुछ न रखा मेरे भाई , इस मुहब्बत में
ये तो इस जग की झूठी ही माया।है ।।

भजन करो उस प्रभु का जिसमें सार है
जग में एक वो ही अनमोल कहाया है ।।

किसी ने कहा दौलत शोहरत को
इससे ही रिश्ते और यश आया है ।।

जानूँ तो मैं भी ये कथायें सारीं 
पर दिल न समझा तड़फाया है ।।

कोहनूर कहते ''शिवम" सभी बड़ा
यहाँ तो कोहनूर भी आधा कहलाया है ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"




विधा : पिरामिड

1)

तू
मेरी
जिंदगी
अनमोल
मेरा वज़ूद
बस तेरे लिये
मेरे जीवनसाथी

2)

मैं
पाता
परम
सुखशांति
तू अनमोल
है जीवनसाथी
सदा निभाना सँग

3)


मन
लुभाते
मनमीत
निभाना प्रीत
तू है अनमोल
जीवन बना गीत

(स्वरचित)


नमन "भावों के मोती"
चंद हाइकु
विषय -अनमोल
28/5/2018
(1)
बेशकीमती
समय "अनमोल"
क्षण का मोल
(2)
प्रेम का रिश्ता
"अनमोल" खजाना
असली धन
(3)
उम्र की शाम
"अनमोल" स्मृतियाँ
आँखों में नाच
(4)
धरोहर है
संस्कृति "अनमोल"
बचाये कौन?
(5)
रत्न समान
"अनमोल" व्यक्तित्व
गुणों की खान
ऋतुराज दवे

Sunday, May 27

"स्वतंत्र लेखन "-27मई 2018




आज बेटी बिलख रही है 
सारे हिन्दुस्तान की
अस्तित्व अपना ढूंढ रही है 
बेटी हर इंसान की

दर्द में लिपटी सिसक रही है
मांग करे अभयदान की
चीख रही है घर की इज्जत
मांग करे इंसाफ की

मां मैं तेरी प्यारी मैना
बाबा का मासूम सा सपना
क्यूं तूने मुझको प्राण दिया
कोख में क्यूं ना मार किया
क्या मेरा दर्द न तूने जीया
मां मेरा क्या जीवन है
दर्द है और सिरहन है
ये इंसानों की बस्ती नहीं है
भेडियों का कानन है
जब जो चाहे चीर हरे
आवारा भी जुमले कसे
जो मैं डटकर खड़ी रहूं तो
तेज़ाब फेंके वार करे
और अगर कुछ बचा रहा तो
व्यभिचार करे अपमान करे
मां अन्तर्मन मेरा जख्मी है
आत्मा भी घायल है
सम्मान मेरा चिथडे हुआ है
वेदना भी भारी है
क्या बताऊं दिल पर मेरे
कितने गहरे घाव पड़े
आंखों से मेरे नीर बहे और
दिल में मेरे शोले भरे
सांस मेरी उखड़ रही है
रोशनी भी मद्धम है
मां मेरा एक काम तू कर दे
खुशियों का संसार जिला दे
जहां रोशनी सुनहरी हो
इंसानों की बस्ती हो
आत्मा ना सस्ती हो
जो तू ये ना कर पाए तो
फिर से बेटी जनम न दे
फिर से बेटी जनम न दे

आज बेटी बिलख रही है 
सारे हिन्दुस्तान की
अस्तित्वअपना ढूंढ रही है 
बेटी हर इंसान की
चीख रही है घर की इज्जत
मांग करे इंसाफ की

स्वरचित : मिलन जैन
दिनांक २७ मई २०१८


भावों के मोती
तिथि -८/५/२०१८
वार-रविवार

विषय-स्वतंत्र लेखन

-"टूट कर भी कभी रिश्ता मिटता नही।"

किसी ने सच ही कहा है –
"टूट कर भी कभी रिश्ता मिटता नही।"

ये तो बंधन है जन्मों का
यूँ पल भर में टूटता नही
इसलिए तो कहते है -
"टूटकर भी कभी रिश्ता........

नही एहसास ये कच्चे धागों का
ये तो अनुभव है बुजुर्गों के तजुर्बों का
इसलिए तो कहते है -
"टूटकर भी कभी रिश्ता.......

ये रिश्ता ही है जो दुख -दर्द में साया बन जाता है
बाहर वालों से पहले काम, घर का इंसा ही आता है
इसीलिए तो कहते है - 
"टूटकर भी कभी रिश्ता......

चाहे मतभेद कितना भी हो विचारों का 
लेकिन मुड़ता है घुटना,घुटने की तरफ
इसलिए तो कहते है - 
"टूटकर भी कभी रिश्ता.....

संसार तो है मीठी माया ठगनी
जो साथ खड़े हो रिश्ते, तो ये उल्टे पाँव भगती
इसलिए तो कहते है - 
"टूटकर भी कभी रिश्ता.....

रिश्ते तीखे - कड़वे, खट्टे- मीठे होते है पर ये ही तो
जीवन सरिता में नीत नई तरंगे भरते है
इसलिए तो कहते है - 
"टूटकर भी कभी रिश्ता......

माना रिश्ते अधिकतर बेहद दर्दीले होते है
पर बच्चों के बालपन तो इन्हीं से शोभित होते है
इसलिए तो कहते है -
"टूटकर भी कभी रिश्ता......

बड़ो के टूटे रिश्ते से ये मासूम अंजान होते है
इनके लिए तो सारे रिश्ते इनकी जान होते है
इसलिए तो कहते है - 
"टूटकर भी कभी रिश्ता.....

बात है बस सबके, निःस्वार्थ भाव से रिश्ता निभाने की
क्योंकि इसी में छुपी है चाबी पल - पल की खुशियों की
इसलिए तो कहते है-
"टूटकर भी कभी रिश्ता.....

रिश्ते ही जीवन का आधार है
मत भागो इससे ये ही जीवन का सार है।
इसलिए तो कहते है - 
"टूटकर भी कभी रिश्ता......

©सारिका विजयवर्गीय "वीणा"


बचपन खो गया 

जिन्दगी तेज गति से

यूँ ही चलती जा रही है।
सोचती हूँ तो याद आता
वो बचपन जो खो गया।।
पापा से जिद्द करना
माँ की ममता की छांव।
दादी से कहानियाँ सुनना
बाबा से झगड़ा हो गया।
वो बचपन जो खो गया।।
नानी घर छुट्टी बिताना
नाना से मन की करना।
भूलूं पर मैं भूल न पाऊँ
रूठा और मै सो गया।
वो बचपन जो खो गया।।
गुड़िया एवं खिलौने मांगना
मिट्टी से दुनिया बसाना।
दोस्तों संग गप्पें लड़ाना
वो बचपन जो खो गया।
ख्वाब मासूमियत सजाना
हर पल अठखेलियाँ करना।
बारिशों की मस्ती मे ढूंढू
वो बचपन जो खो गया।।
ईष्या अहंकार से दूर रहना
अपने अनमोल सपने चाहना।
चाँद तारो की बातें सोचूं मैं
ताकिये से लिपटा रोया।
वो बचपन जो खो गया।
वो बचपन जो खो गया।।

डॉ स्वाति श्रीवास्तव


 स्वतंत्र लेखन।
"एक कदम स्वच्छता की ओर'


मैं इतराऊँ अपने भाग्य पर।
जन्म लिया स्वर्ग से सुन्दर
भारत देश है मेरा देश।
परन्तु जिस भारत की कल्पना
कि हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने
क्या हम उसे बना पाये
हम अपनी नदानियो से।

बाकी परिदृश्यों को छोड़ भी दे तो,
क्या हम इसे सुन्दर स्वच्छ बना पाये।
इसे सुन्दर बनाने की शुरुआत,
क्यों न करें हम अपने घर से।

हम सुधरेंगे तो जग सुधरेगा।
ये तो हम सभी जानते।
बड़े बुर्जुग रखें सफाई का ध्यान,
तो बच्चे सीखें अपने आप।

पड़ोसी समझे प्यार मनुहार से।
फिर वे भी रखे स्वच्छता का ध्यान।

ब्यक्ति से समिष्टि की ओर,
बढ़ते रहे हमारे कदम।
हमारा एक छोटा सा प्रयास,
बना देगा हमारा देश स्वच्छ महान।
स्वरचित-आरती श्रीवास्तव।


 (१)
माँ का रूप अनूप है,आँचल अवनि तुषार
स्नेह सलिल झरता सदा, ऐसा माँ का प्यार

ऐसा माँ का प्यार,बताऊँ कैसे भैया
अपना हर दुख भूल,करें हरदम ता थैया
कहे रागिनी राग,धरणी कि देवी है माँ
बहू बेटी,है बहन,सजती हर रूप मे माँ
(२)
तनया मेरी शान है, परछाई है खास
पावन शुचित सुवास से, मिट जाती हर प्यास
मिट जाती हर प्यास,खिले मुरझाई कलीयाँ
सौम्य सुधा कि धार, फिरे घर आँगन गलीयाँ
कहे रागिनी सूर,स्वरित संगीत असूया
आन बान अभिमान, अबाधित मेरी तनया
(३)
मनसा वाचा कर्मणा, सभी हो एक समान
शायद कहते हैं उसे, मानव वहीं महान
मानव वहीं महान, जटिलता ये है भारी
धरती का हर जन,हो गया एक व्यापारी
कहे रागिनी ज्ञान, रहेगा तब तक झुलसा
धर्म नीति हो न्याय, तभी हो निच्छल मनसा

*रागिनी शास्त्री*
*दाहोद(गुजरात)*

 सदियाँ बीत गईं 
नारी को स्वत की
लड़ाई लड़ते लड़ते

पर हर बार छली ही
जाती है पुरुष के
छल के सामने
हर बार पुरुष की
अनचाही कामनाएँ,
पर-नारी जिस्म की चाहत
विवश कर देती है
नारी को अपमान की
अग्नि में जलने को
तारा,वृंदा,अहिल्या
देवताओं के आगे
विवश उनके कामुक
झणों में छल शापित 
हुईं / सीता भी तो 
पूर्ण समर्पण बाद भी
राम जैसे मर्यादा
पुरुष के हाथों
जिलावतन हुई 
अंबा ,अंबिका
अंबालिका जैसी नारियां
सत्ता स्वार्थ की भेंट चढ़ी
क्या दोष था द्रोपदी का
पति-पुरुष के हाथों ही
दांव लग दंभी पुरुषों की भरी सभा में अपमानित हुई
जब लगन लगाई मीरा ने
कुल कलंकनी, कुल नाशिनी
कहलाई
सदियां बीत गई लेकिन
नारी अब भी छली जाती है
कभी पुरुष के हाथों
कभी अपनी ही जात (नारी)
के हाथों।।
डा. नीलम

प्रथम उषा किरण, सतरंगी दर्शन
ल्पनाओं से सजा,अनवरत सृजन।।

नश्वर देह में मानों प्राणों का सृजन
उल्लास,उमंग,उत्कर्ष का वर्षण।।

चहकी चिड़िया, भँवरों का गुँजन
शीतल पवन,अलौकिक दृश्य आगमन।।

नव चेतन,शुभ प्रभात उषा किरण
संतापों को हरने वाली स्वर्णिम किरण।।

सुक्षुप्त विचार त्यागे आलस्य तन मन
इंद्रधनुषी किरणें स्पंदित करती तन मन।।
**********************************


कुर्सी

कुर्सी बड़ी महान होती हैं

चमचों की गीता और पुराण होती है
पूजी जाती हैं नौकरशाही में
कलियुग में ये भी भगवान होतीं हैं।

कुछ कुर्सियों पे मोह का गोंद लगा होता है
एक बार बैठे तो उठना कठिन होता है
कहीं कुर्सी रेस का समाँ होता है
मौका ताड़ते ही उसे कब्जा लेता है
कुछ कुर्सियों पर पहिए होते हैं
जिन पर बैठकर नीयत फिसलती है
कुछ कुर्सियों का वजन इतना होता है
आदर्शों को ढ़ोना बड़ा मुश्किल होता है
कुछ कुर्सियां बड़ी गरीब होती है 
रिश्वत के पैसों से अमीर होती है
तो कुछ कुर्सियां इतनी खुद्दार होती है
कि बेईमानी की आँधी में टिकी रहती है 
कुर्सियों की महिमा बड़ी न्यारी है 
कुछ को इस पर बैठते ही आती खुमारी है
पद और शक्ति का प्रतीक है कुर्सी
किसी के लिए दौड़ या मौज है कुर्सी
तो कहीं सेवा , समर्पण पे टिकी है कुर्सी

"अंदाज"05मई2020

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