Thursday, June 28

"जन्मभूमि "28जून2018




हे जन्मभूमि तुझको प्रणाम, 
हे मातृभूमि तुझको प्रणाम।
तू हम कवियों की हैआशा,
कविताओं की है परिभाषा।
तू मैथलीशरण की कठिन काव्य,
तू है दिनकर की अभिलाषा।
तू राम कृष्ण की अवतारी
महावीर, बुद्ध की पालनहारी।
तुझमें तुलसी, सूर, कबीर हुए,
हुए रहीम, रसखान, बिहारी।
गंगा यमुना हैं तेरी कंठहार,
नर्मदा ,ताप्ती कमरबंध।
सिरमौर हिमालय भूधर है,
सागर पखारता पदारबिंद।
हे जननी तेरे चरणों में,
श्रध्दा सुमन समर्पित हो।
जब जब तुझपर संकट आये,
ये शीश मेरा भी अर्पित हो।
स्वरचित
शिवेन्द्र सिंह चौहान(सरल)
ग्वालियर म.प्र.


जहाँ घिसटे धरती पर वो धरती न्यारी न भूले।
 वो माँ के आँचल में छुपकर प्यारी किलकारी न भूले ।
बचपन के वो मित्र सखा वो यार वो यारी न भूले ।
जन्म भूमि प्राणों से प्यारी उसकी रखवारी न भूले ।
स्वर्ग से सुन्दर जन्म भूमि की चहारदिवारी न भूले
माँ के पीछे पीछे चलना वो आँचल सारी न भूले ।
बड़े हुये स्कूल का बस्ता माँ की बलिहारी न भूले ।
बरसातों में नाव चलाना वो खेत की क्यारी न भूले ।
आँगन में तुलसी का पौधा छत की फुलवारी न भूले ।
वो सुबह का सूरज वो रात की अँधियारी न भूले ।
स्वप्न सलोने बुनने की ''शिवम" तैयारी न भूले ।
स्वर्ग समान जन्म भूमि की यादें सारी न भूले ।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"



स्वरचित लघु कविता
विषय जन्मभूमि

दिनांक 28.6.18
रचयिता पूनम गोयल

सबसे न्यारी , मुझको प्यारी , मेरी जन्मभूमि , मेरी मातृभूमि !
जिस धरती पर मेरा जन्म हुआ , है वन्दन् तुझे , मेरी मातृभूमि !!
तेरी मिट्टी में खेल-खेल कर , मैनें बचपन बिताया है !
फिर जवानी की दहलीज़ पे कदम रखकर , जीवन का आनन्द उठाया है !!
प्राणों से भी प्रिय मुझे तू , हूँ नतमस्तक बारम्बार ! 
सब न्यौछावर है तुझ पर , है ह्रदय की पुकार !!
हे जन्मभूमि ! हे मातृभूमि ! है तुझे सदैव नमस्कार !
तेरी मिट्टी को होवे , मेरा प्रणाम् शत्-शत् बार !!



 आज के शीर्षक " जन्मभूमि" पर मेरी ये रचना " एक शौर्य" आप सबकी नजर............
एक शौर्य


मैं खुद मिटटी राजस्थान की मेरा कण-कण है महामाया,
पूर्वजन्म का कोई पुण्य है मेरा, जो इस धरा पे जन्म पाया।

सिन्दूर सजाती सुबह यहां देखी, रूप लुटाती फिर संध्या,
एक एक दुर्ग का शिल्प सलोना, और मरूभूमि की सभ्या।

भोर सुहानी घर-घर मीरा गाती, पौरूष प्रताप सा यूं गरजे,
मेरी धरती के वो नौनिहाल, कैसे रेतीली सीमाओं पर बरसे।

दोहे-सोरठे, दादू और रैदास सरीखे, कहीं अजमल अवतारी,
दुर्गादास औ पन्ना की स्वामी भक्ति से, मेरी धरती महतारी।

पीथल, भामाशाह, मन्ना से फिर हम सब कैसे पानीदार हुये,
इन सब वतनपरस्तों के तो , हम पल पल के कर्जदार हुये।

इकतारे, अलगोजे, बंसी, ढोलक और कंही पर चंग की थाप, 
तीज, गणगौर पे रंगीली गौरी, और ईसर की फाग पे अलाप।

खङी खेत में फसलें धानी, चातक, मोर, पपीहा पीहू पीहू बोले,
बातें हो गयी बरस पुरानी, आज भी ढोला-मारू का दिल डोले।

मैं मिटटी राजस्थान की मुझमें भी ऐसा हो त्याग,प्रेम,सौन्दर्य 
मेरी काया की मिटटी धोरों में संवरे, मै भी कहाऊं एक शौर्य!!
----------डा. निशा माथुर

ऋषि-मुनियों, साधु-संतों ने 
अपने तप से
जिस भूमि को सींचा है 
लोपा, घोषा, मुद्रा, विश्ववारा ने 
जिस भूमि पे
वेद की रचना की है 
आभा, प्रभा, तेज, रश्मि धारिणी 
वह तप और सृजन की भूमि 
हमारी जन्मभूमि है 

बुद्ध, महावीर और गाँधी 
बहा गये 
जहाँ धर्म की गंगा 
जहाँ से विवेकानंद ने 
अध्यात्म की बातें 
जग को सिखाया 
वह पावन सी भूमि
हमारी जन्मभूमि है 

पद्मावती, कल्पना चावला सी नारी 
पवित्र आँचल, ज्योत्सना सी सुकुमारी 
जहाँ धारण की शक्ति रूप लक्ष्मीबाई 
वह शौर्य सी भूमि
हमारी जन्मभूमि है 

राम, कृष्ण,गुरुनानक जहाँ 
यश का स्वर्ण पथ बुनते हैं
सीता, सावित्री, प्रभावती 
जहाँ
मर्यादा की सजदा करती हैं 
वह कर्म सी भूमि 
हमारी जन्मभूमि है

रवीन्द्रनाथ जैसे बसते जहाँ मानवतावादी 
बन्धुता, समानता, सहिष्णुता बसते जहाँ कण-कण में 
सत्य, अहिंसा से अंकुरित 
वह भूमि हमारी जन्मभूमि है

वीर शिवाजी, प्रताप जहाँ स्वाभिमान का दीप जलाते हैं 
भगत सिंह, राजगुरु जहाँ 
हँसते-हँसते फाँसी पर चढ़ जाते हैं 
वह अमर बलिदानी सी भूमि 
हमारी जन्मभूमि है

त्याग, बलिदान, प्रेम की 
नित्य होती जहाँ खेती है 
जहाँ लोकतंत्र पहले जन्म लिया 
प्रज्वलित होती जहाँ 
समानता की अनमोल ज्योति 
पीयूष सी प्रकाशमय
वह गरिमामय भूमि "भारतभूमि"
हमारी जन्मभूमि है 
@शाको
स्वरचित



जन्मभूमि 
********************

हे जन्मभूमि आपको मेरा बारम्बार प्रणाम है
कण कण में यहाँ कृष्ण के वास हैं 
यही हमारे संस्कार हैं 

हे जन्मभूमि आपको मेरा बारम्बार प्रणाम है 
बहती यहाँ गंगा यमुना सरस्वती है
यह अमृत सुधा सी धारा है 

हे जन्मभूमि आपको मेरा बारम्बार प्रणाम है 
ऋषिमुनी और संतों की तपोभूमि है
संस्कृति ये हमारी है 

हे जन्मभूमि आपको मेरा बारम्बार प्रणाम है 
यह प्रताप अशोक गुप्त की वीरभूमि है
इसी भूमि ने लक्ष्मी बाई सी वीरांगना पाई है

हे जन्मभूमि आपको मेरा बारम्बार प्रणाम है 
पूरब से आती पवन भी यहाँ इठलाती है 
हरियाली लेती यहाँ अँगड़ाई है

हे जन्मभूमिआपको मेरा बारम्बार प्रणाम है 
रंग बिरंगे फूलों से भरा चमन हमारा है 
हर ॠतु की छटा यहाँ निराली है 

हे जन्मभूमिआपको मेरा बारम्बार प्रणाम है 
जन्म लिया इस पावन धरा पर 
ऐसा सौभाग्य हमारा है 

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल




 II जन्म भूमि II माँ भारती....

वंदन करूं मैं किस विध तेरा...

रूप बनाया रचयिता ऐसा तेरा...
तेरे अधरों पे सजाई मुस्कान है
माँ भारती हम सब की पहचान है.. 

सर हिमालय गर्व है जिसका... 
झुक जाए सर हर किसी का...
तिलक करने को रहते तत्पर...
तेरे रणबांकुरे माँ हर पल आतुर...

ज्योत सुनहरी जलाये प्रथमाकर...
असम, अरुणाचल, मेघालय दिवाकर...
हर कोई करे अर्चना भावों से...
मन में उभरते आह्लादों से...

शांत रूह से करते जो श्रृंगार हैं... 
खजुराहो, साँची और उज्जैन हैं... 
मध्य प्रदेश सब करता मुहाल है...
गर्व करता भारतीय हर हाल है....

शान्ति दूत भारत का जग को...
पश्चिम में वहां उसका स्थान है...
हर और जिसने तेरा नूर बढ़ाया....
जग में वो महात्मा कहलाया....

उत्तर में बसती तेरी ही जान है....
गर्व से कहते वो हमारी शान है...
स्वर्ग धरा पे उतर आया जहां पे...
ऐसा रूप कश्मीर हिंदोस्तान है...

धर्म का डंका जिसने जग में बजाया..
भारत का अध्यात्म रूप दिखलाया....
कन्या कुमारी वो तेरा परम् स्थान है....
विवेकानन्द ने दिया रूप महान है....

हर परबत में तेरा अडिग श्रृंगार है...
नदियाँ..सागर तेरे संगीत गान हैं...
जब तू मुस्काये...चहचहाये है...
तेरे संग हर दिल खिल जाए है....

तेरा रूप बखान करूं मैं कैसे...
निशब्द मेरी है कलम माँ जैसे...
तेरे रूप में सब की ही शान है...
माँ भारती! हम सब की जान है...

II स्वरचित - सी.एम्.शर्मा II



शीर्षक: जन्मभूमि

है जन्मभूमि ही कर्मभूमि

इस पर समर्पित जान है
ये है गौरव भाल हमारा
इस पर जीवन कुर्बान है

हिमगिरि सा तेज हमारा
ह्रदय में गंगा धार है
सद्भाव संस्कार हमारा
धर्मनिरपेक्ष अधिकार है

भिन्न भिन्न हैं रुप हमारा
भिन्न मिन्न श्रृंगार है
अनेकता में एकता ही
देश का आधार है

है सम्पन्न मेरी मातृभूमि
भव्य इसका विस्तार है
ज्ञान विज्ञान में नभ को चूमे
ये समृद्धि का भण्डार है

भव्य मेरी मातृभूमि पर
हो रहा संहार है
बाहर भीतरी ताकतों ने
रौंदा ये संसार है

घृणा की दीवार गिराकर
भेदभाव को हरना है
कुत्सित मानव धारणाओं पर
शक्ति प्रहार करना है

कर्तव्य पथ पर कदम बढ़ाओ
स्वार्थ का बहिष्कार करो
देश को चमकता ध्रुव बनाओ
थोड़ा तो परमार्थ करो

ये जन्मभूमि है पावन धाम
इसका सब सम्मान करो
विश्व पटल पर लहराए तिरंगा
थोड़ा तो पुरुषार्थ करो

विश्व शांति है ध्येय हमारा
अहिंसा हमारा नारा है
दुनिया में सबसे प्यारा
भारत देश हमारा है

स्वरचित : मिलन जैन




" जन्मभूमि "

जननी जन्मभूमि से प्यारा कुछ हो नहीं सकता

जननी जन्मभूमि से न्यारा भी कुछ हो नहीं सकता

इस जननी जन्मभूमि के सेवा में सदा रहता हूँ तत्पर

सिर इसकी सेवा में ग़र कटे तो इससे बेहतर कुछ हो नहीं सकता

हज़ारों जिंदगी हैं कुर्बान मेरी जननी जन्मभूमि पर

इसकी इज़्ज़त आबरू पे जो आँच लाये वोह जिंदा रह नहीं सकता

हज़ारों लाखों वीर सदा रहते हैं समर्पित इस जन्मभूमि की सेवा में

ऐसे जननी जन्मभूमि हो पराश्रित ऐसा कभी भी हो नहीं सकता..

(स्वरचित)

Manage



-----------
अपनी प्यारी जन्मभूमि का

 
शब्दों में चित्र बनाती हूं

 
जन्म लिया, बचपन खेला

 
उस माटी से मिलवाती हूं ,


दूर शहर से सड़क किनारे 


था छोटा सा प्यारा गांव

 
टप- टप घोड़ों की टापें

 
ले जाती थी पीपल छांव
 ,

छोटे- छोटे मोड़ों वाले

 
रस्ते पर बच्चों का जमघट

 
दरवाजे पर रुकते ही

 
बीच चौक पर छोटा पनघट ,

'बिचली हवेली ' नाम से

 
जाना जाता था मेरा घर

 
कितने सारे रिश्ते नाते

 
सुख की बरखा चार पहर ,

बांध रखा है यादों से


अब उन सब तस्वीरों को 


जी करता है फिर हो आऊं

 
तोड़ के सब जंजीरों को ,

पर अब न रहे वो रिश्ते नाते

 
ना ही वो घर द्वार रहा 


यादों में ही जीवित है

 
सपनों का संसार मेरा 

सपना सक्सेना

 
स्वरचित

* जन्मभूमि *

महसूस की है

 
मैने तुम्हारी सुगंध

 
फूलो से भी पहले

 
कोमल स्पर्श

 
मैने पाया है तेरा

 
तेरे नरम आंगन में

 
गिरा तो थामा तुमने

 
और चलना सिखाया

 
हारने लगा तो 


जीतने का पाठ पढाया


विश्वास दिया कि

 
साथ है मेरे सदा तू

 
मै जहां भी हूं

 
सांसों मे महकती तू

 
तुझे पाने की जुत्सजु

 
तेरे साथ रहने की आरजू

 
और वादा मेरा हे जन्मभूमि

 
न्यौछावर सब तेरे लिए सदा 


ख़्वाहिश पाउं तुमको ही हर बार

 
नमन हे जन्मभूमि तुमको बारम्बार

 

स्वरचित


कमलेश जोशी

 
कांकरोली राजसमंद


जन्मभूमि


आओ एकता के गीत गुनगुनाएं


जन्मभूमि की शान हम बढ़ाएं


जात-पात से ऊपर उठकर


नव संगीत धरा पर लाएं।।

ताज ही मेरा हिमालय भूषण


कन्याकुमारी चरण आभूषण

मध्य में सांची मन रमता है
ब्रह्माण्ड जन्मभूमि पे सजता है।।

जन्मभूमि कर्तव्य दिखलाती


सहृदयता की सीख सिखाती


सप्तऋषि नभ मंडल में है


माँ गंगा यहाँ गीत सुनाती।।

सदा रहो तुम निश्छल मन के


प्रेम रूप अपना लो सबके


जन्मभूमि है कर्म प्रधान


सदा करो सबका सम्मान।।

वीणा शर्मा




Wednesday, June 27

"मिलन"27जून2018



*मिलन*
---------
धरती से आकाश का मिलन

बरखा की बूंदो में छलकता
आकाश की प्यास बुझान को 
धरती सागर रीता करदेती है

मिलन फूल का भंवरे से
कितना गहरा गूढ़ रहा
प्यास प्रीत की खातिर
बंद पंखूड़ी में होता है

मिलन समर्पण का तीव्र 
शलभ चराग का होता है
क्षण मात्र के सुख खातिर
अग्नि स्नान कर जाता है

सागर के प्रेम में डूबी
नदियां तो हर बंधन तोड़ जाती हैं / बाधाएं पर्वत सी
कितनी सबको लांघ आती हैं

प्रीत की बांसूरी मोहन की
जब राग प्रेम का गाती है
ग्वाल बाल, गोपिया सब
राधा संग लोक-लाज त्याग आतीं

मिलनयामिनी में निशा जब
अंधकारमय होता है
तब कोई हीर,शीरी,लैला,साहिबा
पिय से मिलने आती है।

डा.नीलम






मिलन 

न है जब तेरे मिलन की आस

चाहिए हमें नहीं मधुमास !
खिलेंगे जब पतझड़ के फूल
चुभेंगे बनकर के नव शूल
भ्रमर की गुंजन धुन सुन पास
खोल देती कलिका दल न्यास
नहीं ये प्रीत नहीं परिहास
न है जब तेरे मिलन की आस
चाहिए हमें नहीं मधुमास !!
प्रीत गर तुमको है कोई भूल
झाड़ देना ज्यों लिपटी धूल
बनेंगे हम भूला इतिहास
बनो प्रियतम की प्रीत प्यास
प्रेम का मिले नया आकाश
नहीं जब तेरे मिलन की आस
चाहिए हमें नहीं मधुमास !!!


शीर्षक: मिलन 

आई मिलन की बेला

हृदय बजे शहनाई
मन आंगन उत्सव छाया
बहार ले अंगडाई

निशा चमचम ओढ़ चुनरिया
रवि से मिलने आई
खुशी ओस सी बरस रही
भोर करे अगुवाई
आई मिलन की बेला
हृदय बजे शहनाई

मन्दिर घण्ट मंगल गाएं
कोयल ने कूक लगाई
रुत सतरंगी ख्वाब सजाए
धरा पर बासंती छाई
आई मिलन की बेला
हृदय बजे शहनाई

रूत फागुनी देख पिया जी
जियरा मोरा तड़पे
पिया मिलन के प्यासे नैना
मेघा जैसे बरसे
आई मिलन की बेला
हृदय बजे शहनाई

कर सोलह श्रृंगार पिया जी
प्रीत मिलन धुन गाऊँ
तुम संग घर आंगन महके
नित मधुमास मनाऊं
आई मिलन की बेला
हृदय बजे शहनाई
मन आंगन उत्सव छाया
बहार ले अंगडाई

स्वरचित : मिलन जैन
दिनांक : 27 जून 2018




विषय-मिलन
विधा-गीत
रचयिता-पूनम गोयल

गीत 
तुझे इतना प्यार कर लूँ , तुझे इतना प्यार कर लूँ !
जीवन निसार कर लूँ , जीवन निसार कर लूँ !!
१-ना जाने , कब ? सफर ये , ज़िन्दगानी का खत्म हो !
ना जाने , कब ? ये सांसों की डोर , तन से गुम हो !!
उससे भी पहले मैं तो , इज़हार-ए-इश्क कर लूँ !
तुझे इतना.....................,
२-छोटी मिलन की घड़ियाँ , बड़ी लम्बी है जुदाई !
किन मुश्किलों के बाद , ये सुहानी बेला आई !!
मैं समय को क़ैद करके , इन मुठ्ठियों में भर लूँ !
तुझे इतना.....................
३-जानें क्यों ? वक्त लेता , है इतने इम्तिहान !
हो जाते हैं फनाँ फिर , कितने दिल-ओ-जान !!
जी-भर के आज़ तेरा , याराँ दीदार कर लूँ !
तुझे इतना...................




आज के शीर्षक " मिलन" पर मेरी ये रचना
 " सांस सांस चन्दन हो गयी ...आप सबकी नजर .....................साँस साँस चंदन हो गयी

मैं! नीर भरी कुंज लतिका सी 

साँस साँस महकी चंदन हो गयी
छुई अनछुई नवेली कृतिका सी
पिय से लिपटन भुजंग हो गयी!

अंगनाई पुरवाई महके मल्हार सी 
रूप रूप दर्पण मधुबन हो गयी
प्रियतम प्रेम में अथाह अम्बर सी
मन राधा सी वृंदावन हो गयी!

गात वल्लरी हिल हिल हर्षित सी
तरूवर तन मन पुलकन हो गयी
मैं माधवी मधुर राग कल्पित सी
मोहनी मूरत सी मगन हो गयी!

अनहद नाद उर की यमुना सी
मन तृष्णा विरहनी अगन हो गयी
भीगी अलकों की संध्या यौवना सी
दृग नीर भरे नैनन खंजन हो गयी!

मैं! विस्मित मौन विभा के फूल सी
बूंद बूंद घन पाहुन सारंग हो गयी
बिंदिया खो गयी मेरी सूने कपोल 
साँसों से महकी अंग अंग हो गयी!

डा. निशा माथुर



भा.27/6/2018(बुधवार )शीर्षकःमिलनःःः
मेरा मिलन ईश से हो जाऐ।
मन लीन भक्ति में हो जाऐ।

छूटे इस जगत मोह से बंधन,
प्रभुजी भव से मुक्ति हो जाऐ। 

व्याह के पश्चात बिदाई होती है।
मिलन के बाद जुदाई होती है।
नियति बनाई भगवान ने ऐसी,
एकदिन काया से मुक्ति होती है।

ये जीवन चक्र यूंही चलता है।
मानव थकता कब रूकता है।
प्रकृति के नहीं नियम बदलते,
मानव जो करता वैसा भरता है।

आज आऐ हैं कल जाना होगा।
हमें अपना कर्तव्य निभाना होगा।
सांसारिकता के जो नियम बने हैं,
उनका पालन करना कराना होगा ।

दुख से सुख का मिलन होता है।
चंदा का चांदनी से संगम होता है।
सबके निश्चित नियम प्राकृतिक हैं,
जुदाई अपना जुडा मिलन होता है।
स्वरचितः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना, गुना म.प्र.
जय जय श्री राम राम जी



II मिलन II 

क्यूँ वीणा है मौन मेरी...

नयनं में भी नीर नहीं... 
विरह सलिल तृषित नहीं... 
हृदय में क्यूँ पीड़ नहीं....

क्यूँ पंक में पंकज खिले...
सरिता सागर में क्यूँ मिले...
नाद दनादन गूंजे भीतर...
शोर बाहर क्यूँ नहीं मिले....

धीरज ध्यान धर्म सब गूंगे...
बहरे हुए हैं कर्ण सभी के...
वैरी हाथ में ज़हर लिये हैं...
प्रेम मधुशाला क्यूँकर भीगे…

विरह पुलकित दर्द निहारे...
मलिन नीर हुआ गंगा धारे..
नाव डूब कर लगी किनारे....
रूह मिलन हुआ प्रीतम द्वारे..

II स्वरचित - सी.एम्.शर्मा II




मिलन की आस में जिये जाता हूँ

कितने गम के घूँट पिये जाता हूँ ।।

जख्मों से छलनी दिल सियें जाता हूँ
आयेगी घड़ी इंतजार किये जाता हूँ ।।

बेवजह इल्जाम भी लिये जाता हूँ
तरन्नुम बनी गीत लिखे जाता हूँ ।।

कोई सुने न सुने खुद सुने जाता हूँ
प्यार भी क्या चीज बहे जाता हूँ ।।

''शिवम्" साज छेड़े बजे जाता हूँ
गीत और गज़ल नित लिखे जाता हूँ ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"



 " भावों के मोती "
बुधवार -27/6/18
दैनिक कार्य 


मिलन
--------
सांझ मिलन की बेला में 
दिन रात गले जब लगते हैं ,
रवि विदाई लेता है 
तारागण उगने लगते हैं...

देहरी देहरी आँगन आँगन 
दीप प्रज्वलित होते हैं ,
अंधकार की चूनर को 
कोटि किरण से धोते हैं ....

घंटे अजान और शंखनाद 
श्रवण पथ पावन करते हैं ,
परम शक्ति के स्मरण क्षण 
अंतस आकुलता हरते हैं ....

फिरने लगते हैं पंछी दल 
दिनभर के श्रमफल साथ लिए ,
पथ पर लोचन बिछ जाते हैं 
अपनों के मिलन की आस लिए ।।

सपना सक्सेना 
स्वरचित



ऐ मेरी प्रियतमा 
क्या करूँ 
जो आप आ जाइए 
मेरे उदास मन में 
मुस्कान भर जाइए 

रात कब से ठहरी हुई थी 
अभी-अभी
शशि ओझल हुआ 
रवि निकल आया 

सूर्य रश्मि से मिलन कर 
लहर-लहर 
अँगड़ाई लेने लगी 
पंछी चहकने लगे 
कलियाँ खिलने लगी 

पर मेरा मन व्याकुल ही रहा 
होगा आप से कब मिलन 
दिन-रात सोचता रहा

ऐ मेरी प्रियतमा 
अब आप आ जाइए 
मेरे दिल में भी 
मुस्कान का अंकुरण 
कर दीजिए 
मेरे रग-रग में भी हो 
प्रेम का प्रस्फुटन 
मेरे ह्रदय में 
प्रेम सरिता बहा दीजिए 

कर मधुर मिलन मुझसे 
अपने तपन से 
मुझे शीतल कर दीजिए
अपने तन की खुश्बू से 
मुझे सुगंधित कर दीजिए 
कर मुझे आलिंगन 
आनंद रस की 
अनुभूति करा दीजिए

मेरे दिल में भी हो 
मोहब्बत का स्पंदन 
अपने स्पर्श से 
मुझ में प्रेम का 
रोपण कर दीजिए 
मैं भी हर पल 
प्रेम रंग में रंगा रहूँ
ऐ मेरी प्रियतमा 
आकर मुझसे 
मधुर मिलन कीजिए 

ऐ मेरी प्रियतमा 
क्या करूँ 
जो आप आ जाइए 
मेरे उदास मन में 
मुस्कान भर जाइए ।
@शाको
स्वरचित






"अंदाज"05मई2020

ब्लॉग की रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं बिना लेखक की स्वीकृति के रचना को कहीं भी साझा नही करें   ब्लॉग संख्या :-727 Hari S...