Thursday, May 30

"बँटवारा"29मई 2019

ब्लॉग की रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं बिना लेखक की स्वीकृति के रचना को कहीं भी साझा नहीं करें |
                                       ब्लॉग संख्या :-401
नमन मंच भावों के मोती
शीर्षक     बँटवारा
विधा       कविता
29 मई 2019,बुधवार

अद्भुत कथा बँटवारे की
युगों युगों से चलकर आई
स्वार्थ समाया होता इसमें
हर मानव ने मुंह की खाई

राम रहीम का बँटवारा
धन और धरा का बँटवारा
आज़ादी मिली देश को
होगया पाकिस्तान बँटवारा

मात पिता का है बँटवारा
बहिंन भाई में है बँटवारा
त्याग करें अगर स्वार्थ का
क्यों फिरे नर मारा  मारा

धर्मो को भी बाँट लिया है
गीत सदा स्व धर्म के गाता
सत्य अहिंसा सदमार्ग है
नित बोलो जय भारत माता।।

स्व0रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।
🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺


भावों के मोती
शीर्षक- बँटवारा
हर चीज का बँटवारा करना मगर
माँ-बाप का कतई नहीं।
जिनको ईश्वर ने जोडा है,
उन्हें अलग करने का
तुम्हें कोई हक नहीं।
वरना इनके हृदय के आँसू में
तुम्हारा सुख-चैन बह जाएगा।
मां-बाप को दुःख देने वाले को
ईश्वर भी माफ न कर पाएगा।
स्वरचित
निलम अग्रवाल, खड़कपुर

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

#।। बँटवारा ।।#

महाभारतें हो जातीं 
नाम बुरा बँटवारे का ।
हो मुल्क या हो परिवार 
सब सोचें उआरे न्यारे का ।
भाई भाई दुश्मन बन जायें
वो भूलें प्यार गभुआरे का ।
अपनी ढपली अपना राग
इन्तज़ार पत्नि के इशारे का ।
पाई पाई का हिसाब माँगें 
लिहाज न पिता प्यारे का ।
माँ एक तरफ आँसू डारे
क्या हाल लाल विचारे का ।
नीति अनीति की बँधी पोटरी 
बुरा हाल घर के उजियारे का ।
बँटवारे में दिल भी बँट गये 
मकां लेना पड़ा उन्हे भाड़े का ।
वाह दुनियावी दर्द क्या लिखूँ
ये काम है ''शिवम" सरतारे का ।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 29/05/2019

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺
नमन  मँच  भावों के मोती 
तिथि।         29/05/19 
विषय          बँटवारा
**

बँटवारे का दंश झेलती 
मैं रेडक्लिफ सीमा रेखा हूँ ।
खामोश लबों को  किये रही
आज दिल की कहने बैठी हूँ !
तुमको जाने की जल्दी  थी
तो क्यों आये थे तुम,यहाँ
परिस्थिति से अनभिज्ञ  थे तुम
कागज पर रेखा खींच गए।
घर आँगन बँट गए लोगों के, 
खेत खलिहान तहस नहस हुए 
ऐसी क्या मजबूरी थी 
रातों रात ये काम हुए
कानों कान खबर न हुई 
सबूत ,अल्फाज सब मिटा दिए ।
जाने के पहले  हृदयविदारक
मंजर  तो देखा होता 
कितनी बहु बेटियों पर
जुल्म का नंगा नाच तो देखा होता ।
मैं सीमाओं मे अरसे से बंधी 
अपनी मर्यादा जानती थी ,
बरसों से पीड़ा सहती आई 
अब हृदय विदीर्ण ,लहूलुहान मेरा
मैं रेडक्लिफ सीमा रेखा हूँ ।
घुसपैठियों का वार सहा नही जाता 
सीजफायर का उल्लंघन देखा नहीं जाता 
एक ही अभिलाषा है मेरी 
भारत के नीति नियंता से 
देश के वीर सपूतों से,
खत्म  करो मेरा अस्तित्व
मेरा इतिहास बदल दो 
देश का भूगोल बदल दो 
करो अपनी सीमाओं का विस्तार,
मुझे सीमाओं के बंधन से मुक्त करो
बंटवारे के दंश से मुक्त करो ।

स्वरचित
अनिता सुधीर

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

नमन मंच भावों के मोती
शीर्षक-बँटवारा
दिनांक-29/5/2019

सुत ने मां के हार का, लगा लिया है मोल।
झर- झर आंसू बह रहे, सुनकर कड़वे बोल।।1

#बँटवारे ने लील ली ,बाबा जी की जान।
बँटवारा न देख सके, बनते सुत अनजान।।2

पांँच गाँव न दे पाया, हुआ सुयोधन क्रुद्ध।
माधव भी न रोक सके, कुरुक्षेत्र का युद्ध।।3

#बंँटवारे की आड़ में, दिखा लहू का रंग।
टूट गए कच्चे रिश्ते, पड़ा रंग में भंग।।4

शालिनी अग्रवाल
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित
🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

खुश हो कर त्योहार  मनाने से पहले। 
कुछ सोचो घर द्वार  सजाने से पहले।

देखो भाई बिन क्या तन्हा जी पाओगे। 
अपने आंगन मे दीवार उठाने से पहले। 

मन को  रोशन  कर लेते  खुशियों से। 
तुम  दीपक दो  चार जलाने से पहले।

फिक्र जरा होती  अपनों की गैरों की।
खुद को  लम्बरदार  बनाने  से पहले।

अदब और कायदा  तुम भूल गए हो।
इस  बर्बादी को  यार बनाने से पहले। 

थोड़ा सा  किरदार  बना लेते  अच्छा। 
तुम बंगले मोटर कार बनाने से पहले। 

हम पर  हंसने वालों  कोई  बात नहीं। 
तुमसे  हमें है  प्यार  जमाने  से पहले। 

अभी बहुत लम्बा रस्ता दूर है मजिंल। 
जरा सोच कदम चार उठाने से पहले। 

तौल के अपना दिल  देख कभी लेना। 
सबको झूठा मक्कार बताने से पहले। 

आज दहन करले द्वेष  मन के सोहल। 
ये झूठे पुतले हर बार जलाने से पहले। 

                            विपिन सोहल

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺


नमन -मंच
वार - बुधवार
तिथि - 29 मई 19
विषय बँटवारा के तहत, मेरी लघुकथा नीम का पेड़

मंगलू के स्वर्ग सिधारने के तुरंत बाद,बड़े बेटे की बहू ने अपने पति से कहा-"अभी तो सारे लोग  इक्कठा है कमला के बापू ।"
"अभी करवा लो, जो भी बंँटवारा करना है वो सबके सामने। 
"हाँ मैं भी यही सोच रहा हूँ।
कल तीये की बैठक के बाद ही बात छेड़ दूँगा।
अगले दिन सोहन ने अपने छोटे भाई को बिठाकर, घर का हिस्सा बाँट दिया बीच में एक दीवार बनाने का फैसला किया,मगर नीम का पेड़ बीच में आ रहा था।
दोनों भाईयों ने कटवाने का निश्चय किया।
तभी बहन मीरा बोली,"इसे तो मत काटो।"
दोनों भाभियाँ तुरंत तुनक कर बोली-"क्या तुम आओगी अपने ससुराल से सफाई करने ?वो तो पिताजी नई काटने देते थे,नहीं तो हम तो कब का कटवा देते।
मीरा  ने भाभियों से बहस करने उचित नहीं समझाऔर अपने दोनों भाईयों को बिठाकर  कहने लगी-
"बताओ भईया इस पेड़ के साथ हमारी कितनी यादें जुड़ी है।
"पिताजी ने कितना संजोकर रखा था इस पेड़ को।
हम तीनों भाई- बहन  इसी के नीचे पले बड़े। खेले -कूदे।वो याद है झूले पर झूलते हुए सबसे ऊंँची डाली को छूना।वो निबोरी खाना।
वो सुबह -सुबह इसकी दातून करनाऔर छोटे- मोटे घाव,फुंसी सब इस नीम ने ही ठीक किये है।

 नीम का पेड़  ऊपर से कह रहा था-" लाख समझा लो,कोई फायदा नहीं बेटी। ये वही करेंगे,जो इनकी पत्नियों ने कह दिया।
"इन्हें कुछ भी याद नहीं आएगा। काट लेने दो इन्हें।
जो पिता के जाते ही  जायदाद के बँटवारे में लग गए  वो मेरी कीमत क्या जाने।
मुझे भी नहीं रहना इनके साथ।
नीम के पेड़ की बातें सुनकर मीरा समझ गईऔर अब उसने कुछ भी याद दिलाना उचित न समझा...

स्वरचित
गीता लकवाल
🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

भावों के मोती 
सादर प्रणाम 
विषय =बँटवारा
विधा=हाइकु 

बढ़ता जाए
करिए बँटवारा
ज्ञान का धन

स्वार्थ की नीति 
किया है बँटवारा
हिंद व पाक

बचा ही लेता
रिश्तों में  बँटवारा
स्नेह का भाव

पाक की मंशा
कश्मीर हो हमारा
हो बँटवारा

बच्चों ने किया
माँ-पिता बँटवारा
संस्कार खोया

करके गए
देश का बँटवारा
यहाँ अग्रेंज

===रचनाकार ===
मुकेश भद्रावले 
हरदा मध्यप्रदेश 
29/05/2019

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

29/5/19
भावों के मोती
विषय - बँटवारा
__________________
बड़ा ही दुखदायी होता
जब बँटवारा सहना पड़ता है
तिनका-तिनका जोड़ा
बनाया सपनों का घरौंदा
जज़्बातों के रंग भरकर
हर एक ईंट को जोड़ा
अरमानों के दीप जलाकर
किया था उजाला घर में
प्यार की बारिश करके
दिल के टुकड़ों को सींचा
एक-एक कोने में रची-बसी
जीवन की अनमोल यादें
कब बेटों ने स्वार्थ में भुला दी
माता-पिता का तोड़कर दिल
घर के बँटवारे पर आ गए
टुकड़े-टुकड़े कर दिए रिश्ते
बँटा आँगन बँट गई दीवारें
खड़ा पेड़ आँगन में सहमा
प्यार से था जिसे सींचा
माँ-बाप भी बँट गए
किस्मत के मारे दोनों बेचारे
बुढ़ापे में एक-दूसरे से दूर
बेटों के हाथों होकर मजबूर
आँसू भरी आँखों से रहे देखते
आँगन के बीच दीवार बनते
किसी के हिस्से में माँ आई
किसी के हिस्से में पिता
बड़ा ही दुखदायी होता
जब घर का बँटवारा होता
***अनुराधा चौहान***©स्वरचित✍

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

सादर नमन
29-05-2019
बँटवारा
उलझे पन्नों को जो छांटे थे
फिर संग मिल हम बांटे थे 
पुराने उन पन्नों को पढ़कर
अतीत की सैर दुबारा कर लें 

सघन तरु की छांव में मिलना
मौन होंठ, नयनों का खिलना 
है स्मृतियाँ देती क्यों कसक
चलो, उसका निपटारा कर लें

मन भीड़ में गुम, एकाकी है
दिल में बस धड़कन बाकी है
घुली हुयी जो साँसें अब तक 
आओ, इसका बँटवारा कर लें
-©नवल किशोर सिंह
     स्वरचित

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

नमन भाव के मोती 
दिनांक- 29 मई 2019  
विषय-बंटवारा 
विधा -कविता

अजीब दृश्य छाया हुआ
आज घर में बंटवारा हुआ

अपने ही जिस्म का बंटवारा हुआ
आज अपना ही पराया हुआ

बिन माँ के जो न निवाला लिया
आज माँ को छोड़ अलग हो लिया

बापू की आँखों का तारा रहा
आज बापू बेसहारा रहा

घर में मनमुटाव क्या हुआ
आज घर का बंटवारा हुआ

माँ का आंसू निकल ही गया
कलेजों का आज टुकड़ा हो गया

सरहद पर आज पहरा हो गया
बिना इजाजत के जाना मना हो गया

कभी भी बंटवारा अच्छा न हुआ
माँ के चरणों को छोड़ जन्नत न हुआ

नीति और ज्ञान धरा रह गया
आज घर का बंटवारा हो गया

मनीष श्री
स्वरचित
रायबरेली

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

भावों के मोती
29/05/19
विषय - बंटवारा 

एक दर्द की ताबीर है बंटवारा
मां बाप के सपनो का उजड़ता महल है बंटवारा
हृदय के दोनो निलय को अलग करना है बंटवारा
जख्म के नीचे  छुपा मवाद  है बंटवारा
टीसता है जो रात-दिन बेपनाह वो घाव है बंटवारा
चाहे देश का हो,घर का या हो दिलों का बंटवारा 
सदा एक नफरत छोड़ जाता है बंटवारा
करना है करो दिल से बैर, द्वेष, राग का बंटवारा
तृष्णा- मोह, क्रोध, लालच, नफरतों का बंटवारा
अभिमान,माया, कलह,अभख्यान का बंटवारा
परम तत्व का हो रहा हर जगह बंटवारा
भुलते हो कल होना है इस देह से भी  बंटवारा ।

स्वरचित

कुसुम कोठारी।

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

नमन "भावो के मोती"
29/05/2019
  "बँटवारा"
################
सम्पत्ति के स्वार्थ की खातिर
टुकड़ों में घर को विभक्त किया,
खयाल माँ के आँचल का किया होता..
बँटवारा करने से पहले ।।

दिन और रात को बाँट लिया
चाँद और सूरज मिलकर..
खयाल शाम का किया होता.
बँटवारा करने से पहले..।।

हमलोगों ने मजहब को भी..
बाँट लिया रंगों मे...
रंग प्रीत का देखा होता..
बँटवारा करने से पहले ।।

निज स्वार्थ से वशीभूत हो.
रिश्तों में पड़ी दरारें.....
सुनीतियों से परखा होता..
मन का बँटवारा करने से पहले ।।

बहू और बेटी में भेदभाव..
बेटी किसी घर की बनेगी बहू
बहू भी किसीकी है बेटी..
सोच तो लेते एक बार...
इन रिश्तों को बाँटने से पहले।।

स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल।।
🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺


नमन मंच 🙏
सभी गुणीजनों को सादर प्रणाम 🙏
शीर्षक- "बँटवारा"
दिनांक- 29/5/2019
विधा- कविता
************
जमीन का तो किया बँटवारा, 
अब तो आसमान भी बँटने लगा, 
इस कलयुग में इंसान का, 
ईमान भी बिकना लगा |

भाई-भाई का मेल न रहा, 
बँटवारा दीवार बनने लगा, 
घर, जमीन के टुकड़े हो गये, 
इंसानियत अब मरने लगी |

बँटवारा बस दर्द ही देता, 
फिर भी इंसान नहीं संभलता, 
गर जो उसकी समझ में आ जाये,
बँटवारा कभी न आये |

 स्वरचित *संगीता कुकरेती*

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

🌹🙏जय माँ शारदे,🙏🌹
नमन मंच,, भावों के मोती,,
19 /5/2019/
बिषय ,बंटवारा,,
 वर्तमान में मानव स्वार्थ 
के बशीभूत जी रहा है
मैं मेरा  की पिपासा का 
प्याला पी रहा है
बंटवारे पर बंटवारे 
बट गए दहलीज द्वारे
देश बंटा प़ांत बंटे 
और बंट गया समाज 
 भाई  भाई आपस में बटे
बदल गया  अंदाज
 अब तो   बृद्ध माँ बाप का 
होने लगा बंटवारा
छिन गया मुँह का निबाला
बुजुर्गों की लाठी का सहारा
 स्वरचित,, सुषमा ब्यौहार

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

II बँटवारा II नमन भावों के मोती....

विधा: लघु कथा

उसकी आँखें दीवार पे टिकी थी... कोशिश कर रही थी दीवार के पार देखने की... जो उसके...उसकी पत्नी और बच्चों में खड़ी हो गयी थी... किसी एक दिल के मानने न मानने से क्या होता... हकीकत तो ये थी की दिलों का बँटवारा हो गया था....  

बड़ी महनत से घर बनाया था उसने... पंछी जैसे घौंसला बनाता है.... हर इच्छा पूरी की थी उसने अपने बच्चों की पत्नी की... आजादी थी सब को.... फिर भी न जाने क्या हुआ कि सब उसे छोड़ कर चले गए.... घर में एक परिंदा रखा हुआ था... बस वही था उसके साथ अब.... पिंजरे में... पिंजरे को न उसने कभी ताला लगाया न बंद किया था...  इतने में पिंजरे का पंछी फड़फड़ाया....उसकी आँखें दीवार से हट कर पिंजरे पर लग गईं....पिंजरे से पंछी ने उसे देखा... गर्दन घुमाई... फुर्र हो निकल गया.... उसकी आँखें खुली स्थिर पिंजरे पर टिकी रह गयीं ....पंछी उड़ चुका था... आखिर आजाद पंछी की तरह उड़ना कौन नहीं चाहता...कीमत चाहे कुछ भी हो ! 

II स्वरचित - सी.एम्.शर्मा II 
२९.०५.२०१९

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

बंटवारा आज शीर्ष कहै,
यह शब्द,
राष्ट्र,
घर,
परिवार को,
तोड़ कर,रख देताहै।
नफरत,घृणा, जलन,ईष्या, बैर को जन्म दे,
खून खराबा,,लड़ाई, हत्या करवाता है।बंटवारा शब्द
घर,परिवार, देश केलिये,
अशुभ अपशुकन है।
इसी शब्द ने,
द्वापर युग मे,
एक परिवार मे,
18/दिन तक महाभारत युद्ध हुआ था।सत्ता, जायदाद, जमीन।जोरुये।
मानव मानव मे युद्ध कराये।बंटवारा शब्द कैसे दिलोदिमाग मे आते है।
जो मानव ता,प्यार, बंधुत्व के विरोधी है।साथियों सबको शुभमध्यान्ह।।

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

शुभ साँझ 🌇
नमन "भावों के मोती"🙏
29/05/2019
मुक्तक    
विषय:-"बँटवारा "
🌵🌵🌵🌵🌵🌵🌵🌵

(1)
अदद एक लकीर ने दो मुल्क बना दिए,
भाई को भाई से लड़ा बीज घृणा  लगा दिए, 
धर्म के नाम ये "बँटवारा" भी क्या खूब रहा, 
मानवता की शर्मसार कई बेटे गँवा दिए l
🌵🌵🌵🌵🌵🌵🌵🌵🌵
(2)
"बंटवारे" की पीड़ा सभी ने  जानी है, 
एकता गर्व मिसालें और कहानी है, 
धर्म  और जातियाँ  आते हैं बाद में, 
सबसे पहले हम सब हिंदुस्तानी हैं l

स्वरचित 
ऋतुराज दवे

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

नमन भावों के मोती 
विषय - बँटवारा 
29/05/19
बुधवार 
कविता 

नेता   ही  बँटवारा  करके
       जनता  को  लड़वाते   हैं,
धर्म,जाति,भाषा को लेकर
       मन   में   कटुता  लाते हैं ।

इस धरती पर सभी शांति से 
         जीवन  यापन   करते  हैं ,
किन्तु देश के शासनकर्ता 
       उन्हें    बाँटते   फिरते   हैं  ।

ये मजहब की बातें करके 
           जनता  को  भड़काते  हैं ,
और धर्म का झांसा देकर 
           सरहद   पर  लड़वाते  हैं।

भी  नहीं ये देख सके हैं
          नके   प्रेमपूर्ण   मन  को ।
रजनीति  से  दूर  पनपती
         एकसूत्रता  की   हद   को।

ब जनता न मान सकेगी
           नकी   टेढ़ी   चालों   को ,
ह नेता पद का  हक देगी 
           नहित  करने  वालों  को। 

अब बँटवारे की बातों को 
           जनता  कभी  न  मानेगी,
वह अखण्ड भारत को अपना 
            उचित लक्ष्य ही जानेगी।

स्वरचित 
डॉ ललिता सेंगर
🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

नमन          भावों के मोती
विषय          बँटवारा
विधा           कविता
दिनांक        29-5-2019
दिन             बुधवार

बँटवारा
🎻🎻🎻🎻

बहुत निर्दयी शब्द है बँटवारा
इसमें लहू सूख जाता है सारा
हम इतने  इसमें बँटते हैं
कि अपना कहने में भी नटते हैं।

दीवारें खिंच जाती हैं
मुठ्ठीयाँँ भी भिंच जाती हैं
जीवन भी बँट जाता है
सौहार्द पूरा कट जाता है।

शक्ति अपनी ही क्षीण होती है
दुर्भावना  ही  प्रवीण होती 
भौतिक लाभ मिले भी तो क्या
आत्मा भी तो मलीन होती है।

स्वरचित
सुमित्रा नन्दन पन्त
जयपुर

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺
शुभ साँझ 🌇
नमन "भावों के मोती"🙏
29/05/2019
हाइकु (5/7/5)   
विषय:-"बँटवारा"
(1)
प्रश्न उलझा 
बाँट ली जायदाद 
कैसे बाँटे माँ 
(2)
शिक्षा असार 
बँटवारा देखती 
माँ चुपचाप 
(3)
जीवन ऋणी 
हिस्से में आ गई माँ 
वो बेटा धनी 
(4)
उखड़ा प्यार 
बंटवारे ने किया 
संकीर्ण द्वार 
(5)
छोटा संसार 
बँटवारे की बाड़ 
घृणा ही पार 

स्वरचित 
ऋतुराज दवे


🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

नमन भाव के मोती 
दिनांक- 29 मई 2019  
विषय-बंटवारा 
विधा - ग़ज़ल

वीगा जमीन यूँ मकानों में बंट गया।
फिर यूँ हुआ चंद ठिकानों में बंट गया।

बेसबब मुझसे कोई आकर कह गया,
घर का बटवारा विवादों में बंट गया।

भाई ही भाई का दुश्मन बन बैठा,
कोर्ट में पेश संवादों में बंट गया

आपस में झगड़ते रहते थे नित रोज,
भाई का प्यार दीवारों में बंट गया।

आपसी मनमुटाव बढ़ गया इसकदर,
बड़ा सा गोदाम दुकानों में बंट गया।

सुमन अग्रवाल "सागरिका"


🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

🌹🙏नमन मंच🙏🌹
आदरणीय जनो को नमन
🌹🙏       🙏🌹
विषय-बंटवारा
दिनांक-29/05/19

भाई,भाई एक दूसरे की चिकचिक से तंग थे
गाँववाले भी ये देखकर दंग थे

बंटवारा निश्चित हुआ आज
घर में था सन्नाटा नहीं कोई आवाज

बड़े के ह़क एक कमरा छत आया
तो छोटे ने कहर ढाया
मझला आँगन को अड़ा रहा
तो संझला हक जमाये परछी पर खड़ा रहा

बड़ा चार गिलास, मंझला लोटा ले गया
छोटा चूल्हा-अंगीठी,संझला परात ढो गया

बहूएँ भी सास के जेवर को ललचाती रहीं
तिथीवार रोटी को बुलाती रहीं

बड़े के घर से रोटी खाकर माँ बाहर निकली
छोटे के घर पान उठाया ही था कि बेटे की जुबान फिसली

माँ जानती नहीं बंटवारा हो चुका है आज
तेरा खाना पानी बड़े के घर निश्चित हुआ है आज

माँ फफककर रो पड़ी करती फरियाद है
मेरे बच्चों तुम्हारे घर कभी न हो #बंटवारा
मेरा आशीर्वाद है।।

  ***स्वरचित****
 --सीमा आचार्य--
🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺


देश भारत
क्यों हुआ विभाजित
सत्ता लालसा।।

हुये बेघर
बटवारा दुखद
निरीह मरे।।

बंटा भारत
कैसे हुआ स्वीकार
चाचा व जिन्ना।।

बंटते घर
होते खून खराबे
कैसी नियति।।

बाप बेटवा
बने जानी दुश्मन
घर बटाई।।

ज़ेवर बंटा
जमीन विभाजित
कोई न ले मां।।

भावुक

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

सादर नमन
आज का शीर्षक- बँटवारा
      "बँटवारा"
बचपन के दिन वो प्यारे,
कैसे तुम भूल गए,
भूल कर बचपन के सपनों को,
सजा लिए अब सपने नए,
जिस आँगन की धूल में ,
हरदम तुम सने रहे,
क्यों करते हो मेरा बँटवारा ,
आँगन आज ये कहे,
बच्चे पास पड़ोस के,
इस आँगन में चहकते रहे,
आज इस घर के बच्चे ही,
पूरे आँगन को तरस रहे,
खिंची आँगन के बीच ये रेखा,
सुनों ध्यान से क्या कहे,
ना भूल माँ की ममता को,
 आँखों से इसकी आज आँसू बहे।
**
स्वरचित-रेखा रविदत्त
29/5/19
बुधवार
🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

नमन मंच 
२९/०५/२०१९
मौलिक एवं अप्रकाशित 
विधा मुक्त 
विषय: बॅटवारा,
**************
बॅटवारा,
शब्द मात्र एक,  संदर्भ अनेक !  
बॅटवारा,
कभी कारण, कभी अकारण !
बँटवारा,
आवश्यक कभी अनावश्यक !
बँटवारा,
कभी अर्थगत, कभी अर्थहीन !
बॅटवारा, 
पाने के लिए, कभी खोने के लिए !
बॅटवारा, 
सुख कारक, कभी दुःख कारक !
बॅटवारा, 
कभी हँसाता है कभी रुलाता है !
बॅटवारा, 
कभी दिल से, कभी दिमाग से !
बॅटवारा, 
कभी अपनों से, कभी परायो से !
बॅटवारा, 
कभी नियति से, कभी नियत से 
बॅटवारा, अंतत:, निश्चित, अपितु, 
सहमति से हो जाए तो हितकारी 
असहमति से  हो तो अहितकारी !!
!
स्वरचित: डी के निवातिया

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

नमन भावों के मोती,
आज का विषय, बँटवारा
दिन, बुधवार
दिनांक, 29,5,2019

ईश्वर ने दिया सभी को समानता से प्यार  ,

सबके लिए बनाया एक ही धरती और आकाश।

बाँट लिया हमनें ही सब कुछ रखा नहीं विश्वास,

जाति धर्म रंग भेद लिंग भेद कितने भेद की बात ।

बँट गया टुकडों टुकडों में हमारा सभ्य समाज ,

भाई भाई के बीच खड़ी हो गई स्वार्थ की दीवार ।

हुए अजनबी रिश्ते नातें  बँट गया मात पिता का प्यार,

सीमायें देशों की बँट गयीं बँट गया इंसान का प्यार ।

कुटुंब कबीला सब बँट गये हो गये  एकल परिवार

सुख सुविधाएं भी बँट गईं हो गये गरीब  लाचार ,

धीरे धीरे समाज में हो गया  वर्ग भेद का बिस्तार ।

बँटवारे से व्यथित हुआ है अपने पन का भाव ।

लगा है ऐसा घाव जिगर पर भरता ही नहीं है घाव।

स्वरचित, मीना शर्मा, मध्यप्रदेश,
🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

नमन भावों के मोती आ0 डा0अंजू लता सिंह जी
आज का शीर्षकः- बटवारा

होना चाहिये आपस में केवल सम्पत्ति का बटवारा।
डटे रहें सब सत्य पर नहीं ले कोई झूठ का सहारा।।

घर का मुखिया करे नहीं, बटवारे में कोई पक्षपात।
प्यार बनाये रखने के लिये यही लाख टके की बात।।

परन्तु बटवारे में तो देते हैं सब अपनों को ही धोखा।
झूठ बोलने का छोड़ता नहीं वह कभी कोई भी मौका।।

झगडा बढ़ने पर अन्त में बटवारा न्यायालय में जाता।
आपस में तो बट नहीं पाता माल वकीलों में है बंटता।।

डा0 सुरेन्द्र सिंह यादव
“व्यथित हृदय मुरादाबादी” 
स्वरचित

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

शुभ संध्या
#।। बँटवारा ।।#
द्वितीय प्रस्तुति

नदियों का जल बाँट रहे 
आगे बाँटेंगे क्या मेघ ।
शायद कोई युक्ति आए
इंसा बाकई अद्भुत नेक ।
अदभुत तो है ही जाना
मगर नेक में है संदेह ।
हर क्षेत्र में बेशक अनुपम
हो मुल्क या व्यक्ति विशेष ।
नेकी यह भाई भाई से बैर
गई इंसानियत गया विवेक ।
दिल दिमाग से बड़ा था
आज दिमाग की है टेक ।
आपा खोए जरा जरा में 
पापा की सही न देखरेख ।
बँटवारा सुन आँसू आए
अनहोनी की आशंका एक ।
बिगड़े हों अगर बेटे तो
अनहोनी की लिखे सुलेख ।
बँटवारे से पहले पढ़ लें 
गली मोहल्ला क्या प्रत्येक ।
खुद तमाशा बनें ''शिवम"
ऐसी स्वारथ की लपेट ।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 29/05/2019
🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

नमन मंच को
दिन :- बुधवार
दिनांक :- 29/05/2019
विषय :- बंटवारा

अधनंगी लाशों के अंबार देखे...
बंटवारे में जलते घर बार देखे..
लुटती रही अस्मत नारियों की..
मौन धरे सियासती दरबार देखे..
बंटवारा हुआ था दो मुल्कों का..
हमने खून के उड़ते गुबार देखे..
सत्तामद ने ये क्या करवा दिया..
हर जगह धार्मिक उन्माद देखे..
टूट रहे थे  तब  मंदिर  मस्जिद..
मौन अहिंसा  के पेरोकार देखे..
हर तरफ बस पसरा था मातम..
बिलखते  मासूम चित्कार देखे..

स्वरचित :- मुकेश राठौड़


🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

नमन भावों के मोती
दिनाँक -29/05/2019
शीर्षक -बँटवारा
विधा-हाइकु

1.
प्रेमी प्रेमिका
बँटवारा अनोखा
प्यार या धोखा
2.
अंग्रेज नीति
बँटवारा हिन्द का
बदनियती
3.
लक्ष्य चुनना
बँटवारा करना
कठिन कार्य
4.
स्वार्थ भावना
बँटवारा दिलों का
टूटते रिश्ते
5.
गुरु व शिष्य
करते बँटवारा
निज ज्ञान का
**********
स्वरचित
अशोक कुमार ढोरिया
मुबारिकपुर(झज्जर)
हरियाणा

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺


नमन मंच
विषय -- बंटवारा
विधा --मुक्त
दिनांक--29 / 05 / 19
-------------------------------
कितना कितना
भयावह होता है
बंटवारे की
पीडा़ वहन करना
वो आधी रात
याद है ना
देश का एक हिस्सा
जब मगन हो
स्वतंत्रता की
दिवाली मनाने में
वहीं दूसरी ओर
उन्ही दीयों से
उठी लौ ने 
घर ही नहीं
जज्बात भी
जला कर खाक
कर दिये थे
उधर जल रही थी
लाहौर की गलियां
यहाँ अमृतसर
सच कहूँ तो
जल रहा था
इकबाल का
सारे जहां से अच्छा
हिंदुस्तान
जल रहा था
नानक का ननकाना
सुलगती चिंगारियों ने
कहीं जाहिदा की
रुह फूंकी
कहीं सीता जमींदोज
हुई  थी फिर से
सच सत्ता के लोभी
बैठ गये थे
शीतयुक्त बडे़ 
महलों में
और बेचारी 
आवाम भूला बैठी
सदियों के रिश्ते
एक माँ का
दूध भी बंट गया था
भाई भाई से,
माँ बेटे से,
भाई बहिन से,
बाप बच्चों से
पति पत्नी का
बंटवारा भी
हो गया था
सच तो ये है
वही बंटवारे का दंश
आज तक
सरहदों में बंटकर भी
हृदय से निकला नहीं
धीरे धीरे 
नासूर बन कर
सभी की रगो में
कम और ज्यादा
बह रहा है ।

      डा.नीलम.  अजमेर

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

भावों के मोती दिनांक 29/5/19
बँटवारा

जो झेलता है
दर्द बँटवारे का
हो जाता है 
दिल उसका 
तार तार 

आजादी के बाद
बंटवारे का
दर्द  सहा है 
भारतीयों ने

एक घर में 
जब होता है
बंटवारा 
टूट जाते है
बूढे माँ बाप 

मौत दे दे 
भले ही मौला
पर न दे वह
बंटवारा 
जीवन में 

स्वलिखित 
लेखक संतोष श्रीवास्तव  भोपाल

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

"नमन-मंच"
"दिनांक--२९/५/२०१९"
"बँटवारा"
मनभेद से मतभेद हुआ
हुआ घर का बँटवारा
चाँद तो एक ही रहा
चाँदनी मध्य ,दीवार कंटिला खड़ा।

ईष्या व लोभ ने किया
बँटवारा का खेल सारा
स्मरण न रहा माँ बाप का प्यार
हो गया घर आँगन का बँटवारा।

माँ बाप के सामने हुआ,
उनका घर का बँटवारा
ये तो हुआ अपराध बड़ा
अपकीर्ति तो होगा ही,होगा

सुदूर परिणाम भी  बड़ा,
आगे आये जब राह कंटिला
भाई ही आते भाई के काम
इसे क्यों भूले नादान इंसान।

माँ बाप ही इस धरती पर
होते है भगवान
उन्हें हम कभी न बाँटे
उन्हें खुश रखना हमारा काम।
स्वरचित-आरती-श्रीवास्तव।

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

स्वरचित हाइकु

(1)

हाय! चीत्कार
बंटवारा जरूरी 
करें स्वीकार

(2)
मां और बाबा 
बंटवारा क्यों करो
जीते जी मरो
(3)
खड़ी दीवार
बंटवारे की रार
हा! अश्रुधार
(4)
दो बेटों की मां
बंटवारे में घिरी
 रही बिखरी

     _____
स्वरचित हाइकु 
ड.अंजु लता सिंह 
नई दिल्ली


नमन मंच 
29/5/2019
बंटवारा 
सास बहु के बीच में बंटा पति बेचारा, 
किसे मनाये किसे रुठाये, हुआ जो बंटवारा, 
क्यों न समझे नार ये जिद्दी माँ है वो बेचारी, 
फंस गया है फर्ज के कर्ज में 
क्या करे बेचारा ll

सच है शादी से पहले ना होती थी रार, 
जब से ये संगिनी आयी खींची है तलवार 
भाई बहनो को अलग कर दिया, 
रिश्ते बेमानी हो गए खींची बंटवारे की दीवार ll
कुसुम पंत उत्साही 
स्वरचित 
देहरादून

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺
भावों के मोती  : प्रदत्त शब्द : बँटवारा 
******************************
रुक रुक कर गुज़री मगर शाम गुजर गई 
अब ये किसे मालूम कहाँ गई ,किधर गई।

बात जो निकली तो बँटवारे पर आ रुकी 
कुछ यादें इधर रहीं तो कुछ यादें उधर गईं ।

न जाने किस मुक़ाम पर ठहरना होगा अब 
हम तो बस वहाँ चल पड़े ये राहें जिधर गईं ।

कुछ लमहे निशात के रख कर भूल गए हम 
उनकी जुस्तजू में बेसबब हमारी उमर गई ।

आने वाले तलातुम का शायद उसे अंदेशा था 
साहिल से मिलकर गले उदास सी हर लहर गई ।

बेआशना सी लगती है ये ज़िंदगी की तस्वीर भी
बेरंग और ख़ौफ़ज़दा सी जहाँ तलक नज़र गई ।

बडी शिद्दत से है इंतज़ार ख़ुशियाँ लौटेगी,हो न हो
हर छोटी बडी गलियों से गुज़रते जाने कहाँ ठहर गई ।

 स्वरचित(c)भार्गवी रविन्द्र .....बेंगलूर ....२९/०५/२०१९
निशात - खुशी , जुस्तजू - तलाश , तलातुम - तूफ़ान ,

बेआशना - अपरिचित ,


🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

नमन मंच को 
दिनांक-29/05/2019
विषय-बँटवारा
जाने कितने बेघर हो गए जब हुआ देश का बंटवारा ।
जाने कितने जीवन लुट गए जब हुआ देश का बंटवारा । 
जाने कितनी फांसे पड़ गईं जब हुआ देश का बंटवारा ।
बंटवारा बेहद कड़वा होता है,चाहे देश का हो या घर द्वारा।
घर आँगन बट जाते हैं ,बँट जाता है चौबारा ।
वह भी पराया हो जाता है जो लगता था अति प्यारा ।
बंटवारे की आग में जलकर कभी जला बचपन प्यारा ।
बंटवारे में बंट गई ममता ,  बट गया भाई का भाई चारा। 
बहना खड़ी द्वार पर सोचे कहाँ गया आँगन प्यारा ।
बंटवारा एक शब्द नहीं है यह अहसासों का हत्यारा ।
स्वरचित 
मोहिनी पांडेय

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

नमन भावों के मोती
आज का विषय, बंटवारा
दिन, बुधवार
दिंनाक 29.5.2019

                   बंटवारा

मिलकर ही जो हो 
हर काम का बंटवारा
जीवन रसमय सा लगे 
फिर यारा
एंकाकी परिवार तभी लगते सूने.. संयुक्त परिवार से जब हारा मानव बेचारा 
सोचनीय बात है यहां
पुरखों की सोच व भावी पीढ़ी की सोच में भी हुआ बंटवारा
बंटवारा हुआ धर्म के नाम पर
ये पचा भी न पाये थे अभी
कि इंसा का  विचारों में भी, होने लगा बंटवारा
उपर चेहरे पर दिखे हंसी
अंदर धधक रही ज्वाला
कैसा -कैसा है ये बंटवारा
कैसे समझे मन ये हारा

एकता कोचर रेलन
हरियाणा
🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺
नमन भावों के मोती 🌹🙏🌹
29-5-2019
विषय:-बँटवारा 
विधा :-हाइकु 

तलाक़ लिखा
बँटवारा दिल का 
आज भी बाक़ी 
धार्मिक हिंसा 
घोषणा बँटवारा 
पीड़ित मर्म 
प्रसव पीड़ा
बँटवारा रिश्तों का 
स्थायी क्रंदन 
ब्रह्मांड सत्ता
बँटवारा अंड का 
सृष्टि निर्माण 
माँ बाँट लेते 
लकीरें नहीं खिंचें
रक्त रंजित  

स्वरचित :-
ऊषा सेठी 
सिरसा १२५०५५ ( हरियाणा )


🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺







Tuesday, May 28

"पर्वत/पहाड़"28मई 2019

ब्लॉग की रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं बिना लेखक की स्वीकृति के रचना को कहीं भी साझा नहीं करें |
                                       ब्लॉग संख्या :-400




पर्वत पर जमी बर्फ की तरह
बेशर्म उम्र के अनुभव का पहरा
चेहरा बदल कर जिंदगी
कितने पहरे लगा देती है।

कभी उजली धुप सी
कभी भरा हुआ आकाश
और कभी डूबते सूरज का
अंतिम पैगाम सुना देती है।

बचपन, जवानी और बुढ़ापा
स्थितियां धरा के रूप सी
जिंदगी वक्त के साथ-साथ
आखिरी सलाम बता देती है।

सिद्धान्तों में पलकर जीना
सुख को सलाम देना है
रोटी से रिश्ता तोड़कर
सूना शमशान दिखा देती है
चेहरे बदल कर जिंदगी
कितने पहरे लगा देती है।

श्रीलाल जोशी "श्री"
तेजरासर, बीकानेर ।
(मैसूर)
🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

सादर नमन पटल
दिनाँक-28/05/19
विषय-पर्वत/पहाड़
विधा-ग़ज़ल

काफ़िया-ई
रदीफ़-है
वज्न-2122 2122

अब मुहब्बत ज़िन्दगी है।
ज़िन्दगी में क्या कमी है।

साथ  है  मेरे  ख़ुदा  तो।
शम्अ ये तब ही जली है।

झील पर्वत और नदियाँ
उसकी ही रहमत हुई है।

ढूँढता  फ़िरता  रहा  तू।
वो ही तो इक रौशनी है।

ज़िन्दगी में है सुकूँ ग़र।
तेरी आकिब' सादगी है।

*-आकिब जावेद*
स्वरचित/मौलिक

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

🌹🙏नमन मंच🙏🌹
आदरणीय जनो को नमन
🌹🙏       🙏🌹
विषय-पर्वत/पहाड़
दिनांक-28/05/19

हर माँ कहे मुझको भी
इक अभिनंदन चाहिए
दुश्मन पर टूटे वार करे
शेरों सा गरज संहार करे
अब न देश में होता कोई
क्रंदन चाहिए।

हो ललाट गजराज सा जिसका
वक्ष दहकती ज्वाला
#पर्वत सा जो अडिग रहे
कर काम हिमालय वाला
माँ भारती को ऐसा ही
रघुनंदन चाहिए
हर माँ कहे मुझको भी
इक अभिनंदन चाहिए।
  ***स्वरचित****
 --सीमा आचार्य--
🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

नमन मंच भावों के मोती
शीर्षक   पर्वत,पहाड़
विधा      लघुकविता
28 मई 2019,मंगलवार

प्रकृति की शौभा पर्वत से
जड़ी बुंटिया हैं अपरिमित
नानाकार वृक्ष आच्छादित
रवि रश्मियां होती प्रमुदित

उद्भव होती गङ्गा यमुना
बद्री और केदार विराजे
ऋषि मुनि पावन स्थली
अति दूर से सुन्दर साजे

मानसून आकर्षित करता
वर्षा पर्वत पर होती निर्भर
इठलाती सरिता बहती नित
गिरिराज निरखे नीलाम्बर

हिमगिरि के उत्तुंग शिखर से
जल गिरता अति नाद करता
गौ मुख गङ्गा पाप विनाशनी
सुर नर मुनि मानस को हरता।।

स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।
🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺


पर्वत पहाड ही भारत
 की सुन्दरता दर्शाते
खुली हवा खुली 
जलवायु लाते
जीवन में नई 
बहार लाते
माँ के मनोरम
मंदिर दर्शाते
आज उनको
तोड रहे गट्टी के लिये
भारत की प्राकृतिकता
को नष्ट कर रहे हैं
अपना काम बना रहे हैं
धन राशि के चक्कर में
प्रकृति दोहन कर रहे हैं
स्वरचित एस डीशर्मा
🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

## पर्वत/पहाड़ ##

जब चले हवा पहाड़ को पड़े झेलना 
बड़ा कठिन होता संघर्षों से खेलना ।।

जो जितना बड़ा उतने संघर्ष लिपटे
यह सत्य है यह सत्य सदा उकेलना ।।

देख उनको अपने गम किये कम
शुक्र है उन जैसी अपनी रेल ना ।।

उनकी तो हरदम ही रेल रहती है
आँधी तूफान पड़े उनको ठेलना ।।

बड़े की चाह में कुछ ज्यादा गम 
किस्मत को होते है उडे़लना ।।

हमने भी अब सीखा है ''शिवम"
जाना है इन गमों को धकेलना ।।

पहाड़ को जानिये पहचानिये
रहिऐ पास रहिऐ अकेल ना ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 28/05/2019

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

नमन माँ शारदे  
28/5/2019
पहाड़ का दर्द समझाने का प्रयास 
मेरी प्रथम गढ़वाली कविता... 
         #मेरुपहाड #
मेरु पहाड़ त्वे क्या हुवै ग्याई, 
हरयाली त्यारी कख ख़ुवै ग्याई, 
कोदू, झंगोरु कु पुन्गंडा, 
अबत दिखण बिसरिय ग्याई l

छोड़ि बुए बूबा कु घोर, 
वै नानी दादी कु छुआड़, 
वि बौंण की घसियारणं, 
कख गै बाघ की दहाड़l

पानंदीयारिण   कु पांणी कु जांण, 
बंटा मुंड मा धैरी की हिट हिटांण, 
कख गई वो गाड.. गदना, 
रुणु लग्युं च यु सरु पहाड़l

ओ नोना बाला बोडी घोर ऐजा, 
खुद लगंणी तुमरी तेरु बुए -बाबा, 
सुन्नू वै गई सैरु... पहाड़, 
अब तू अनवार मैते दिखेजा ll
कुसुम पंत उत्साही 
स्वरचित 
देहरादून

"मेरा पहाड़"
मेरे पहाड़ तुझे क्या हो गया है
हरियाली तेरी कहाँ खो गयी है
मंडवे का आटा, झंगोरे के खेत
अब दीखते ही नही हैं।

सब अपने माँ बाप 
नानी दादी सबको छोड़ निकल गए हैं 
कहाँ है जंगलों में घास काटने गयी घस्यारी और विलुप्त हो चुकी बाघ की दहाड़।

पानी के लिए पन्देरे 
(पानी का प्राकृतिक श्रोत)
में जाती महिलाएँ
और बंठा/कसेरा यानि गागर अपने सर पर रख कर वापिस होती हुई अब दिखाई ही नही देती।
वो प्राकृतिक स्रोत भी वैसे नही रहे।
पहाड़ भी अपनी हालत पर रो रहा है।

ओ बच्चो अब घर लौट आओ
माँ बाप को तुम्हारी बहुत याद आ रही है
पहाड़ सूने सूने लग रहे हैं
अब तो अपना चेहरा हमे दिखा जाओ।
इसका अनुवाद मेरी प्रिय सखी और भुली Chauhan Sangeetaजी ने किया 
शुक्रिया सखी


🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺
नमन           भावों के मोती
विषय          पहाड़
विधा            कविता
दिनांक         28.5.2019
दिन              मंगलवार

पहाड़(संक्षेप में)
💖💖💖💖💦💦

उत्तराँचल के पहाड़ों की छटा बताई है

प्रकृति की अनोखी शैली,
दूर दूर तक है फैली,
रमणीय माने क्या होता है,
वर्णनीय कैसा होता है,
गगन चूमना किसे कहते,
शिखर घूमना  किसे कहते,
बर्फीला आँचल कैसा होता,
झरने का छलछल कैसे धोता,
किसे कहते प्रकृति की गोद,
कैसे होता ईश्वरीय बोध,
ये दर्शन होते हैं साक्षात,
आनन्द की होती है बरसात।

यह देव भूमि पावन भूमि,
श्रध्दा से जिसने चूमी,
उसने ईश्वरीय बस्ती घूमी,
उन्माद लहर उसकी हुई दूनी,
यह पहाड़ है पहाड़ है पहाड़ है,
ईश्वरीय आनन्द की बहार है।

ओम नमः शिवाय।

स्वरचित
सुमित्रा नन्दन पन्त
जयपुर

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

नमन मंच ,भावों के मोती 
18/5 /2019
बिषय पर्वत पहाड़
वो गुजरे गली से मेरी 
आकर चले गए 
मैं देखती रह
नजर झुका कर चले गए
मालूम न था इक दिन 
ऐसा भी आएगा
समझा जिनको अपना 
बेगाना बनाकर चले गए 
जमाने ने जाने कितने जख्म
हैं दिए
ये पर्वत पहाड़ से गम  
दिल में छिपा कर चले गए
आज नहीं तो कल  
वक्त अपना भी आएगा 
छोटी सी आरजू मन में 
जगाकर चले गए 
वो भुला कर चले गए 
हम निभा कर चले गए।।
स्वरचित,,
सुषमा,, ब्यौहार,, 
सादर अभिवादन,,,,


🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

नमन भावों के मोती
दिनाँक - 28/5/2019
आज का विषय - पर्वत/पहाड़

---स्वर्ग सी शांति---

घूमने  गया 
गया मैं शिमला
शिमला में  पहाड़ 
पहाड़   ऊंचे  - ऊंचे
ऊंचे - ऊंचे   घने  पेड़
पेड़ों पर चहचहाते पक्षी
पक्षियों की  कलरव ध्वनि
ध्वनि   जैसे   मधुर   संगीत
संगीत  ऐसा  जो  लुभाये मन
मन   में   चल   रहा  था  विचार
विचार  जो   झंकझोर   रहा   दिल
दिल कहता कितना गिर गया इन्सान
इंसान  स्वार्थ  की ख़ातिर  काट रहा पेड़
पेडों को करके नष्ट, कर रहा  खत्म जंगल
जंगल में देखो कितना सुकून
सुकून  ऐसा , आभास  स्वर्ग  सा
स्वर्ग  सी  शांति ,  सब   जीव  खुश
खुश   प्रकृति,  प्रसन्नता   ही   प्रसन्नता
प्रसन्नता ऐसी कहां मिलती हैं बन्द मकानों में

         स्वरचित 
     बलबीर सिंह वर्मा 
रिसालियाखेड़ा सिरसा(हरियाणा)

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺
नमन मंच
28/5/2019
विषय  पर्वत

मैं नीरव  निर्जन  तपस्वी का  प्रिय  भूथल 
जीवन  दाई  नदियों   का  मैं  उद्गम स्थल 

कितने  ही  जीवन  अंशों   का  मैं आश्रय 
कितने  ही  वृक्ष , पादपों   का  मैं  आलय 

कहता मानव  मुझको अडिग रुका और जड़ 
मैं  रचता  माटी  का  रूप  स्वयं हो खंड खंड 

जलमग्न धरा से मैंने ही थल को स्वरूप दिया 
लावा  को   शांत  किया  चट्टानों का रूप दिया 

धीरे-धीरे सागर से उभरा ,श्रृंखलाओं को आज़ाद किया
मैं बिखरा  संभला , कितने  ही नगरों को आबाद किया

मैं प्रचंड ताप  विकल पवन और हिमघात सहा
खंडित  खंडित  हो   मैं  धारा  के साथ  बहा

मीनाक्षी भटनागर
स्वरचित

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

नमन भावों के मोती मंच 🙏
दिनांक - 28/05/2019
विषय - पर्वत /पहाड़

🏞️🏔️🏞️🏞️🏞️🏞️
         पर्वत

मैं पर्वत हूँ
युगों - युगों से
समेटे स्वयं में
कितने रहस्य
चुप खड़ा हूँ
बहती है
मेरी भाव धारा
पीयूष स्रोत सी
हृदय की घाटियों से
सँवारी है हमने
धरती माँ के अद्भुत वेश को
हमारी ही गोदी में
समृद्ध और उन्नत हुई हैं
कितनी सभ्यताएं
मैं हूँ साक्षी
अपनी ही कंदराओं के
साधकों के
अपरिमित ज्ञान - विज्ञान के चरमोत्कर्ष का...... ।
देखे हैं हमने
जमाने के कितने रंग. ..
टूटते - बनते मानदंड...
स्वार्थ लोलुपता और
उसकी स्वयं सृजित
विध्वंस लीला....
जिसकी बलि चढ़ता
मैं स्वयं
अपने खोते पुराने स्वरूप को देखता
हताश और निराश
पर मैं डरता हूँ कि
टूट न जाए
धर्य का तटबंध और
बहने लगे दर्द का ग्लेशियर
जिसके सैलाब में
हो जाय स्वाहा
यह पूरी सृष्टि ही.....!

    स्व रचित
          डॉ उषा किरण
         28/05/2019

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

भावों के मोती
28 /05 /19
विषय - पहाड़ /पर्वत। 

ये वादियां ये नजारे, देखो घिर आई घटायें भी
पहाड़ो की नीलाभ चोटियों पर झुकने लगा आसमां भी।

झील का शांत जल बुला रहा,कुदरत मुस्कान बिखेर रही 
ये लुभावनी घूमती घाटियां हरित रंग रंगी धरा भी।

किसी कोने से झांक रही सुनहरी सूर्य किरण 
हरी दूब पर इठलाती लजीली धूप की लाली भी ।

छेड़ी राग मधुर, मस्त, सुरभित हवाऔं ने 
प्रकृति के रंग रंगा देखो आज मन आंगन भी।

स्वरचित।

                    कुसुम कोठारी ।

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

ठिठुर रहा
ओढ़ हिम दुशाला 
बूढ़ा पहाड़ 

चलती नदी 
कर के पहाड़ों का
चरण स्पर्श

वर्षा के बाद 
पहाड़ों ने उठाया 
इंद्र्धनुष

हवा उड़ाए 
बादलों की पतंग 
चढ़ पहाड़

इठला रही
पहन देवदार
नंगी चट्टान

खूब छकाता
छुप पहाड पीछे 
चाँद शैतान

टंगा है चाँद 
चोटी पे पहाड़ की 
लालटेन सा

अंधेरे साये
उतर पहाड़ से
धरा पे फैले

माथे सजता 
सुबह पहाड़ के 
सूर्य तिलक

राजीव गोयल 
🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺
नमन  मंच 
28/05/19 
पहाड़ 
**

पहाड़ों से उतरती धूप
का, देखा जब भव्य रूप
 सौंदर्य से इसके हुए मुग्ध 
अचंभित हो ,हुए निःशब्द 
अधीर हो सुनहरी किरणें
मिली धवल हिम कणों से जब
परावर्तित हो पल  भर मे
चांदी सी  चमक पहाड़ों 
पर  चहुँ ओर छा गयी
देखते देखते  चांदनी  ने 
ओढ़ ली सुनहरी चूनर
पल में  यूँ लजा कर
फिर लाली हो गयी मुखर 
जैसे हो नई दुल्हन का रूप 
यूँ पहाड़ों से  उतरी धूप ।

स्वरचित
अनिता सुधीर

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

सादर नमन
28-05-2019
पर्वत
पथ रोके रोड़े नहीं, पाषाण यहाँ
जीवन राह कठिन आसान कहाँ
इस डगर कभी क्या चला कोई
इस पत्थर को भी है छला कोई
साहस, शक्ति संबल संचय किए
धीरज अटल, ईंधन अक्षय लिए
निरत अहर्निश धुन में मतवाला
रूखा-सूखा खा या बिन निवाला
पथ्य हीन पथ की आस सुहास
सपनों में जीवित कल्प आभास
हे पथिक चले तुम अगम्य राह
विकट बाधा विघ्न से बे-परवाह
आखिर तुमने तो तोड़ ही डाला
पत्थरमुख को भी मोड ही डाला
कृश-काया, बाजू किधर बलवान
सश्रम संकल्प शुचि लक्ष्य संधान
अडिग अविचल अहं अनत पर्वत 
सत्त-श्रम-संबल सम्मुख धरा-नत
-©नवल किशोर सिंह
    स्वरचित

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

द्वितीय प्रस्तुति 

संवाद के द्वारा पर्वत का दर्द ....

****
मैं ...जब भी तुम्हारी गोद में आती हूं तुम्हारे सौंदर्य में खो
       जाती हूँ।             
वो... अब मेरी वह सुंदरता कहां बची!
मैं ...ऐसा क्यों कह रही हो तुम ,देखो ना इन हसीन   
           वादियों को ,कितनी खूबसूरत हैं ये।
वो ....कितनी चोट सहनी पड़ती है कितना टूटना  
         पड़ता है  मुझे ,मेरी इस व्यथा को कौन  
          समझेगा?
मैं ....अपने स्वार्थवश तुम्हारे लिए सोच ही नहीं पाई 
          कि तुम अपना कलेजा चीर कर हमें खुशी देती
           हो और हम  तुम्हें ही खोखला कर रहे हैं
वो .....शुक्र है तुमने मेरी व्यथा तो समझी बस एक 
          निवेदन है मैं जैसी भी हूं मुझे वैसे ही अपना 
          लो ,अब और आघात सही नहीं जाते ।
मैं .......निशब्द थी उसकी व्यथा पर!

स्वरचित 
अनिता सुधीर

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

नमन भाव के मोती
 दिनांक 28 मई 2019
 विषय पर्वत पहाड़ 
विधा हाइकु

निर्जन गिरि
बिखरे हिमकण
विपुल शांति

गिरि आंगन
हिमकण सज्जित 
नवल कान्ति

बर्फ चादर
गिरि काया धवल 
वसन भ्रान्ति

पहाड़ बने
आध्यात्मिक संसार
शान्ति की गोद

पहाड़ों पर
सतरंगी सुषमा
मेघ फुहार

पहाड़ गर्भ
निकलती नदियां
जीवनदायी

साहस देता
पहाड़ों का धीरज
जीवन लक्ष्य

चांदनी रात
चमकता पहाड़
हिम वसन

मनीष श्री
रायबरेली
स्वरचित

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

सादर अभिवादन
 नमन मंच
 भावों के मोती
 दिनांक : 28-5- 2019 (मंगलवार )
शीर्षक : पर्वत / पहाड़ 

पर्वत पहाड़ पर डेरा तेरा 
दर्शन कैसे करपाऊँ मैं 
छोड़ सभी यह रिश्ते -नाते 
तुझको ही अपनाऊँ मैं 
पांच तत्वों से निर्मित काया
 माया में मगरूर रहा 
जप -तप साधन कर न सका 
मन सत्संगति से दूर रहा
 तन का दोष नहीं पर अपने 
मन को क्या समझाऊं मैं
 पर्वत पहाड़ पर डेरा तेरा 
दर्शन कैसे करपाऊँ मैं 
मैं अज्ञानी ज्ञान की बातें
 क्या समझूं क्या गौर करूं
 माया के इस महानगर में
 कहां कहां मैं दौड़ करूं 
तू ही मां तू पिता गुरु मेरे 
तुझ में ही रम जाऊं मैं 
पर्वत पहाड़ पर डेरा तेरा
 दर्शन कैसे कर पाऊँ मैं 
तुम हो अगम अगोचर स्वामी 
करुणानिधान है नाम तेरा 
दीन दुखी को गले लगा कर
 दुख हरना है काम तेरा 
आकर गले लगा लो मुझको
 जीवन सफल बनाऊँ मैं 
पर्वत पहाड़ पर डेरा तेरा
 दर्शन कैसे करपाऊँ मैं 
है वैद्यनाथ अनाथ की नैया
 भवसागर से पार करो 
डूब ना जाऊं बीच भंवर में 
बस इतना उपकार करो 
बना रहूं चरणों का प्रेमी 
 नित नचारी गाऊँ में

 मधुलिका कुमारी "खुशबू"

ये स्वरचित है ।

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺
नमन "भावो के मोती"
28/05/2019
   "पहाड़"
################
दु:खों का पहाड़.....
जग से मिलते हैं जो...
सीने में दर्द दे जाता...
अक्सर मुस्कुराहट छीन लेता है।।

राई का पहाड़.....
बनाता जो इंसान..
खोखली बातें कह जाता...
ईमान को भूल.....
अक्सर सच्चाई का घर भूल जाता है।।

चलना ही है जिंदगी...
जो मन में ठान ले...
पहाड़ बनकर बाधाएँ ...
जो सामने आ जाए...
हौसलों से काटकर...
राह बना लेता है ।।

स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺


नमन मंच भावों के मोती
दिनांक-28/05/2019
विषय- पर्वत/पहाड़
विधा-दोहे

नदी कहे हिमालय से ,रिसिये न बूंद बूंद।
जैव विविधता भी बचे, हिम की पलकें मूंद।।

बढ़े ताप जो धरा का, बह जाएं हिमखंड।
सागर में पानी बढ़े, प्रलय काल का दंड।।

#पर्वत प्रहरी सा खड़ा, करे धरा का त्राण।
 परिवेश यदि हो हरा ,बचें मनुज के प्राण।।

शालिनी अग्रवाल
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

माँ बाप को बोझ 
समझने वालों,
खुद के इर्द गिर्द ही
जीने वालों।
जब तू माँ के गर्भ
में था,
वाक़ई रोज दर रोज
तेरा बढ़ता वजन
मां के लिए पहाड़
बनता जा रहा था,
अंततः जब तू रक्षा
झिल्ली फाड़,
गर्भनाल समेत धरा पर
गिरा।
सचमुच ये समय माँ
के लिये प्राण घातक था।
लेकिन माँ नें इस दर्द को
भी सुखद अहसास में
बदला,
सोच आज वही माँ
तेरे लिए कैसे भार है??
भावुक

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺
नमन भावों के मोती  🌹🙏🌹
28-5-2019
विषय:- पहाड़ 
विधा :- सरसी छंद 

शैल शिखर आच्छादित हिम से  , स्पर्श करें आकाश । 
मनमोहक रूप नीहार के , मेघ भरें भुज पाश ।।

बहें हृदय पर झरने नदिया , कलकल करते नाद ।
निर्जनता में जैसे करते , मुखरित हो संवाद ।।

दिनकर करता प्रथम किरण से , टीका उनके भाल ।
उषा भी अभिषेक है करती , पहन सुनहरी लाल ।।

ऊँचे  पर्वत सीमाओं के ,बनते पहरे दार ।
धरती का शिंगार चोटियाँ , साधन भरे अपार ।।

तन कठोर मन कोमल होता , बहता रहता नीर । 
तरु काटते रहते  वक्ष के , घाव करें गम्भीर ।। 

जड़ी बूँटियों  वन औषध का , आकर हूँ भरपूर ।
संसाधन का दोहन करते , हुए  नशे में चूर ।।

कैलाशी से गिरि है शोभित  , बनते उत्सव नैन ।
करें मनुहार गिरिजा से शंकर , परिरम्भन के बैन ।।

प्रेम उद्गार स्वत: स्फुटित हों , देखो गिरि हरिताभ । 
मेघ चूमते नभ से आकर ,पाने को अमिताभ ।।

स्वरचित :-
ऊषा सेठी 
सिरसा 125055 ( हरियाणा )

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

28/5/2019
💐💐💐💐
पर्वत/पहाड़
🌸🌸🌸
नमन मंच।
नमन गुरूजनो, मित्रों।
💐💐🙏🙏
अडिग खड़ा है ये ऊंचा पहाड़,
छटा है इसकी निराली।

झरना झड़, झड़ बह रहा है इसके उपर से,
हवा भी चल रही है मतवाली।

ऊंची चोटी कुछ कह रही है हमसे,
वुद्धि, विवेक हो ऊंचा।

वही पूजे जाते हैं जग में,
जो रहते हैं अटल पर्वत सा।

इससे है निकलती नदियां,
झरने के रूप में बहकर।

करती है शीतल जनजीवन को,
उद्धार करती है पृथ्वी का।

कितने खनिज निकलते हैं,
इसी पहाड़,पर्वत से।

सबकुछ छिपा हुआ है इसमें,
पास देखो जाकर इसके।।
💐💐💐💐💐💐💐
स्वरचित
वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी
💐💐💐💐💐

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

नमनःभावों के मोती
मंगल.,दि.28/5/19.
   शीर्षक : पर्वत
*
पर्वत भूमा - उर  की उमंग।
दृढ़ता , रसमयता संग-संग।
बहुमूल्य वनौषधि वर-दानी।
अन्तर्प्रपातयुत    कल्याणी।।

आश्रय बहु वन्य प्राणियों का।
तपसी,अध्यात्म-ग्यानियों का।
निर्मल निसर्ग का शुचि प्रदेय।
अवदात उच्च गरिमा  अगेय।।
               -डा.'शितिकंठ'

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺


पर्वत राई
हिम्मत के समाने 
जीत की चाह।।

गले पहाड़ 
सहे ताप की मार
डूबे शहर।।

बर्फ की वर्षा
सुहाना था मौसम
सड़क जाम।।

लगे पहाड़
जीना हुआ दूभर
माता के बिन।।

पहाड़ी क्षेत्र
भूलभुलैया मार्ग
जोखिम युक्त।।

करो साहस
कटे कष्ट पहाड़ 
समय दवा।।

उत्तुंग हिम
चढ़े पर्वतारोही
फहरा झंडा।।

गंगा भावुक
🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

भावों के मोती
शीर्षक- पर्वत/ पहाड़
दुःख थै मेरे पर्वत से
और राई सी मैं।
फिर भी हौसला रखा मैंने
तनिक न घबरायाे मैं।
हौले हौले ये दुःख सारे
समय की नदी में बह गए।
आज बहुत खुश हूं मैं,
सुख हो गये पर्वत से
और राई से हुए दुःख सारे।
स्वरचित- निलम अग्रवाल,खड़कपुर

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺


28/5/19
भावों के मोती
विषय -पर्वत/पहाड़
_________________
बचपन से सुनते आए
पहाड़ों के किस्से
कभी असली कभी नक़ली
पहाड़ थे कई किस्म के
कभी दुःख के कभी मुश्किल के
कभी राई का पहाड़ 
बहुत सुना सोचा-समझा
पर समझ नहीं आया
प्रश्नचिंह बन खड़ा हो जाता
राई का पहाड़ होता है कैसा
बड़े हुए तो अब यह जाना
कैसे छोटी-छोटी बातों का
लेकर बहाना
बन जाते हैं पहाड़ राई के
जो बातों ही बातों में
इतने बड़े हो जाते
फिर कोई नहीं चाहता है
चढ़ कर उतरना
सब चढ़ने के लिए तैयार रहते
यह राई के पहाड़ बड़े बेकार होते
मुसीबत बन कर टूट पड़ते
बदल जाते हैं तकरार के साथ
दुःख का पहाड़ बनकर
***अनुराधा चौहान***©स्वरचित ✍

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺
शुभ संध्या
शीर्षक-- # पर्वत/पहाड़ #
द्वितीय प्रस्तुति

बारिश की बूँदें जब गिरें 
पर्वत का हुस्न खिल जाए ।
मायूस पर्वतों को भी कुछ
हंसने का मौका मिल जाए ।
पर्वत नदी सभी उदास हैं
उनका कुछ गम निकल जाए ।
कुदरत के बैठें करीब हम
मानवता के बीज कुछ पल जाए ।
पंछियों के घरोंदे छीने ये गम है
यह गम उन पर्वतों का टल जाए ।
चहल पहल कभी रही वहाँ पर
फिर से वह चहल पहल जाए ।
कुछ हम बहलें कुछ तुम बहलो
पर्वत भी ''शिवम" बहल जाए।
हम सब तो संभले बहुत मगर
वह भी तो कुछ संभल जाए ।
नदी पहाड़ खत्म हुए हैं आज 
है भूल काश ये भूल बदल जाए ।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 28/05/2019

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

सादर नमन
आज का शीर्षक- पर्वत

             "पर्वत"
सिंदुरी नभ की किरणें,
लेती पर्वत का चुँबन,
निकले पर्वत से झरने,
करने नदी का आलिंगन,
पर्वत के तन पर,
श्वेत चाँदी का श्रंगार,
छोड़े निशानी पर्वत पर,
निर्मल झरने की धार।
***
स्वरचित-रेखा रविदत्त
28/5/19
मंगलवार

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

"नमन-मंच"
"दिनांक२८/५/२०१९"
"शीर्षक-पहाड़"/पर्वत"
महानगर के कोलाहल से दूर
चलो करें हम पहाड़ों की रूख
शुद्ध हवा, निर्मल पानी वहाँ पर
अनुपम छटा प्रकृति बिखरे जहाँ पर।

प्रकृति की गोद मे करें विहार
जीवन मे भर जाये असीम उत्साह
लंबे चीड़, देवदार यहाँ पर
लोगों की बोली मे मिठास यहाँ पर

मलिन नही निर्मल मलय यहाँ पर
स्वच्छ अम्बर चाँदनी बिखरे यहाँ पर
महानगर के कोलाहल से दूर
जीवन के मस्ती यहाँ भरपूर।

ग्लोबल वार्मिंग से न हो इन्हें नुकसान
प्रकृति को संरक्षित करना हमारा काम
पेड़ काट न करें इनका नुकसान
तभी सुरक्षित रहेगा हमारा पहाड़।
स्वरचित-आरती-श्रीवास्तव।

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

तिथि  28/5/19
विधा - छंद मुक्त
विषय - पर्वत

तुम पर्वत से
स्थिर, विशाल
दृढ़ता से 
खड़े हो एक छोर पर
मेरी चाहत में
खामोश नजरों से
मुझ से
मुझे ही माँगते
बाँहें फैलाये
पर मैं अकिंचन
क्या दे पाऊंगी तुम्हें
खाली है झोली मेरी
तुम्हारा आग्रह
कैसे स्वीकार करूँ
तुम्हारे प्रेम का प्रतिदान
कैसे दे पाऊँगी
सूने नयनों से
तुम्हें निहारती
खाली दामन लिए
कुछ बूँद
अश्रु छलकाती
इन्हीं पर्वत श्रृंखलाओं में
विलीन हो जाऊंगी
कहीं दूर
और तुम
भीगी पलकों
और भारी मन से
ढूंढोगे मुझे
फलक के सितारों में
न लौट पाउंगी 
फिर कभी मैं
तुम्हारे भिक्षा पात्र में
खुद को समर्पित करने

सरिता गर्ग
स्व रचित

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

नमन भावों के मोती 
विषय - पर्वत/पहाड़ 
28/05/19
मंगलवार 
मुक्तक 

बिना तपस्या किए किसी को ऊँचा लक्ष्य नहीं मिलता।
अथक कोशिशों के  बिन जैसे पर्वत कोई नहीं हिलता।
आत्मनियंत्रण  व  दृढ़ता  से   ही  सब  संभव होता है-
केवल  कोरे  स्वप्नों से  उन्नति का पुष्प नहीं खिलता है।

बेटियों! तुम  अब  हृदय  में  भावना  नूतन  जगा दो।
खोखली  सब  रूढियों  से  दूर  अपना  मन लगा दो ।
लाख   बाधाएं  तुम्हारी  राह   में   आकर  खड़ी   हों-
तुम प्रबल  विश्वास  से  उत्तान  पर्वत   भी  डिगा  दो।

स्वरचित 
डॉ ललिता सेंगर

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

नमन मंच को 
विषय : पहाड़ 
दिनांक : 27/05/2019

पहाड़ 

जंगल पेड़ पहाड़ देखो 
हरियाली की बहार देखो 
जीवन नष्ट करने पे तुला 
इन्सान आज तैयार देखो 
देते पर्वत धरा पे जीवन
कितने सुंदर लगते हैँ वन 
प्रकृति के भिन्न रंग समेटे 
पुलकित करते देखो तन मन 
अपनी लालसाओं के चलते 
उजाड़े नित संसार देखो 
जीवन नष्ट करने पे तुला 
इन्सान आज तैयार देखो 
पहाड़ों से सबका मन हर्षे 
धरा भी खिलती नीर जो बरसे 
कुदरत करें जब  रूप उदंड 
इंसान बूंद बूंद को तरसे 
बुलबले सी औकात नहीं पर 
बनता है होशियार देखो 
जीवन नष्ट करने पे तुला 
इन्सान आज तैयार देखो 
झरने देखो कलकल बहते 
जानवर पंछी ख़ुशी से रहते 
खौफ में  सब जानवर पंछी 
देख के हर  दिन पेड़ कटते 
महत्वकांक्षी इंसान दे रहा 
घुटती साँसों का उपहार देखो 
जीवन नष्ट करने पे तुला 
इन्सान आज तैयार देखो 
इन्सान आज तैयार देखो 

जय हिंद 

स्वरचित : राम किशोर ,पंजाब
🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

नमन भावों के मोती
दिनाँक-28/05/2019
शीर्षक-पहाड़ , पर्वत
विधा-हाइकु

1.
ऊँचे पर्वत
चढ़े पर्वतारोही
दुर्गम रास्ते
2.
खड़ा अटल
हिमालय पर्वत
बना प्रहरी
3.
चाय बागान
फसल पर्वत की
ढलान युक्त
4.
ऊँचे पहाड़
आसमान को छूते
चीड़ के पेड़
********
स्वरचित
अशोक कुमार ढोरिया
मुबारिकपुर(झज्जर)
हरियाणा

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

नमन मंच को
दिन :- मंगलवार
दिनांक :- 28/05/2019
विषय :- पर्वत/पहाड़

पर्वतों सा हौसला लेकर...
खुद को समर्थ बनाया है..
पर्वतों सा धैर्य लेकर..
हर बाधा से पार पाया है..
पर्वतों सी ऊँचाई लेकर..
ख्वाबों को सजाया है..
पर्वतों सा दृढ़ रहकर..
हर कर्तव्य निभाया है..
पर्वतों सा शांत रहकर..
हर गम को भुनाया है..

स्वरचित :- मुकेश राठौड़

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

नमन भावों के मोती 
28 /5 / 19 
विषय -पर्वत /पहाड़ 

अपरिमित सौंदर्य ,दिव्य पावन सादगी ,
वितरागी पर्वत ,करता धरा की बंदगी 
मिहीका  की उड़ती फुहार, 
खींचे अपनी ओर ,
रश्मिरथी की रश्मियां, 
श्वेत रेशमी चादर पर 
दौड़ दौड़ खेलती पुरजोर ।
पर्वतों से बहते निर्झर, 
निर्मल झील ,नदी, संजीवनी की गागर ।
हिमआच्छादित पहाड़ों की ऊंची चोटियां, 
चमचमाते अभ्रक की जैसे भरी बोरियां ।
तपता है, सुलगता है, गलता है, पिघलता है, 
मानव के फैलाये प्रदूषण को 
सीने पर अपने सहता है , चुप रहता है ।
असहनीय पीड़ा जब बढती है फिर 
मनु जीवन कंपीत करता है ।
हे मानव !धरा पर जीवन पलता रहे 
निज स्वार्थ तेरा भी चलता रहे ,
प्रदूषण पर रोक लगा ,
अपनी भूलों पर टोक लगा ।
सुरमई श्यामल बादल घिरने दे 
निर्झर का सुरम्य संगीत झरने दे 
बांध घुंघरू पांवों में 
सलिल सरिता को नृत्य करने दे ।

(स्वरचित )सुलोचना सिंह 
भिलाई  (दुर्ग )

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

सादर नमन
शीर्षक- पर्वत/पहाड़
        "पर्वत"
तेरे प्रेम की स्वर्णिम किरणों से,
हुआ उज्जवल मेरा जीवन,
सुनकर गुँजन भँवरों की,
खिल गया है सारा चमन,
तेरे प्रेम के सागर में,
लहराता है मेरा मन,
उठकर खुशियों की मृदुल उमंग,
कर देती है दुखों का दमन,
किस्मत के सितारों से ,
हो जाती है जब अनबन,
पर्वत समान रखता हौंसलें,
आशा वादी ये मेरा मन,
ना घबराऊँ मैं अब,
आते दुख जब धारा बन,
आँसूओं का सैलाब भी,
करता है झुककर नमन।
****
स्वरचित-रेखा रविदत्त
28/5/19
मंगलवार

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺
शुभ साँझ 🌇
नमन "भावों के मोती"🙏
28/05/2019
हाइकु (5/7/5)   
विषय:-"पर्वत/पहाड़ "
(1)
सम्पदा बसी 
पहाड़ों की गोद में 
नदियाँ पली 
(2)
श्रम विकल्प 
पर्वत की चुनौती 
चढ़े संकल्प
(3)
पर्वत झरे
मेघों का अभिषेक 
गंगा उतरे 
(4)
स्वार्थ ने काटे 
मिल पर्वत-मेघ  
सम्पदा बाँटे 
(5)
वर्षा निखारे
पहाड़ों का श्रंगार 
हरित हार 

स्वरचित 
ऋतुराज दवे

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

नमन मंच
आज का शीर्षक--पर्वत
विधा----मुक्त
दिनांक--28 / 05 / 19
------------------------------
हिमाच्छादित पर्वत
सच बता 
तू क्यों है शीतल
ज्यूं है मौत
तेरा दामन तो
सदियों से
देता ही आया 
सबको जीवन मोक्ष
अथाह,असीम,अडिग
अविचल स्थिर है तू
तुझमें भरा
भंडार अर्थ का
है अमृत रस धार
तेरे दामन में
आश्रयदाता 
बना था प्रलय में
मनुपुत्र का
तब से तो
देता  ही रहा है
मोक्ष मानव को
असीम राशियां
संजीवन की
मिलती तेरी 
देह से
फिर भी 
सच बतला 
तू क्यूं है मौन शव -सा
मानती हूँ 
तेरे स्थिर मन में भी
भरा हुआ 
अवसाद है
तभी तो सहनशीलता का
कभी कभी
टूटता बांध है
फट पड़ता है
कभी अचानक से
फिर भी गरम
राख ही राख
बिखेरता है
मानो.........
अभी अभी हुआ है
तेरा दाह संस्कार।

        डा.नीलम .अजमेर

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

नमन
भावों के मोती
28/5/2019
विषय-पहाड़

पहाड़ हुए अशांत
कभी गोली से कभी हमले से
कभी पर्यटकों के बढते हुए काफिले से
कभी आतंकी गतिविधियों से
घटने लगी है सुंदरता
हरियाली रहित नंगे पहाड़
दरक जाते हैं अक्सर
सहन नहीं कर पाते शोर
अपने ऊपर अत्याचार
आखिर पहाड़ भी दिल रखते हैं
चुक जाती है सहनशक्ति
टूट जाता है सब्र का बांध
कमजोर थके पहाड़
दरक जाते हैं अक्सर
तोडा जाता है इनको निर्ममता से
बनाने के लिए सड़क और सुंरग
प्रदूषण और कचरे से
बीमार होते पहाड़
दरक जाते हैं अक्सर
ये भूस्खलन नहीं
दर्द है पहाड़ों का
जो अचानक बह उठता है
तुम कितने निष्ठुर हो ?
अपना दुःख देखकर भी
पहाड़ों का दर्द नहीं समझ पाते!
ये शांत सुंदर बर्फीले पहाड़
बैचेन हैं अस्तित्व को लेकर
इसीलिए दरक जाते हैं अक्सर

अभिलाषा चौहान
स्वरचित मौलिक

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

नमन मंच को
शैलेन्द्र कुमार प्रसाद 
आज का शीषर्क -पर्वत/पहाड़
सीखो तुम पहाड़ से 
आते है, जब दुख के बादल 
अविचल हो कर लड़ता 
हवा के थपेड़ो से 
उन्हे रोक कर 
मजबूर करता 
अपने तन पर 
बरसने को 
झूमाता है पेड़ो को 
खिलखिलाता है, नदियो को 
झीलो को है भरता 
हरियाली को है लाता 
जीवन देता सभी को

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

नमन मंच को 
दिनांक-28/5/2019
विषय-पर्वत/पहाड़
सीखो पर्वतों से अचल रहना
अपनी आन बान शान में कायम रहना 
सीखो पर्वतों की चोटियों से ऊँचाई की बुलंदियों को छूना ।
सीखो पर्वतों से गगन को भी छू लेना 
सीखो पर्वतों से अपलक अपनी धुन में बने रहना ।
सीखो पर्वतों से एक अलग मापदंड तय करना।
निकालना स्वयं से अनेक नदियों झरनों झीलों को ।
आश्रय देना अनेक वन ,वनस्पतियों ,प्राणी कोल भीलों को ।
ये पर्वत हमारे जीवनाधार है,प्रकृति का सुंदर उपहार हैं।
आओ नमन करे इनकी महानता को ,
और जतन करें पाने को इनकी जैसी उदारता को।
स्वरचित 
मोहिनी पांडेय

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺





"अंदाज"05मई2020

ब्लॉग की रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं बिना लेखक की स्वीकृति के रचना को कहीं भी साझा नही करें   ब्लॉग संख्या :-727 Hari S...