Wednesday, May 2

सौन्दर्य -2 मई 2018


 आज श्रांगार पर मेरी ये कविता------
 "घूँघट पट से नयन झांकती"

जब चांदनी मेरी छत पे पिघले

पूनम का चांद मचलता हो,
जब बरखा रानी बिजुरी को छेङे
मन बैचैनी में बतियाता हो,
जब बूंदों की ताल से मिलकर
शाखों का सावन गाता हो,
जब पांव महावर में रंग कर
प्रीत के फूल खिलाता हो,
तब घूँघट पट से नयन झांकती
मुझसे मिलने आ जाना तुम
दो लाज भरे सुरमई नैनों संग
मुझसे कुछ बतिया जाना तुम!!

जब चंचल नैनों की अनुरक्ति में
कजरा चहका चहका हो,
जब इन गजब घनेरी जुल्फों में
रजनीगंधा महका महका हो,
जब तेरी झांझर की रूनझुन में
मौजों की ता ता थैया हो,
जब दिल की डगमग नैया में
सागर की हैया हैया हो,
तब घूँघट पट से नयन झांकती
मुझसे मिलने आ जाना तुम
दो लाज भरे सुरमई नैनों संग
मुझसे कुछ बतिया जाना तुम!!

जब तेरे दिल की धङकन भी
धक धक धक धङकी हो,
जब मन के सूनेपन की ज्वाला
प्रेम अगन में भङकी हो,
जब बरस बदरिया सावन की
झम झमा झम बरसी हो,
जब तुम जोगन सी बन दीवानी 
पिया मिलन को तरसी हो,
तब घूँघट पट से नयन झांकती
मुझसे मिलने आ जाना तुम
दो लाज भरे सुरमई नैनों संग
मुझसे कुछ बतिया जाना तुम!!

-----डा निशा माथुर/8952874359 whatsapp



सागर की लहरों पर,
उषा किरण सी स्वर्णसुधा बन,
रश्मियों के पुंजों संग,

इक बार प्रिये तुम आ जाना।
माथे पर सिंदूरी सूरज,
आँखों में निशा का काजल।
श्वेत कमल के कर्णफूल
अधरों पर राग सुरीला,
तारों की लड़ियों से माँग सजा,
सोलह श्रृंगार कर ,
इक बार प्रिये तुम आ जाना
सुर्ख धवल पीली साड़ी,
लहरों के वर्तुल से कंगन।
छमछम करती पैजनियां,
काली घटा से गेसू,लहराती हुई ,
इक बार प्रिये तुम आ जाना।
कुछ बातें तुमसे करनी है,
कुछ शब्द तुम्हारे कर्णप्रिय,
आत्मसात मुझे करने हैं।
सारे जग के बन्धन से,
मुक्त स्वयं को करके।
अनन्त मार्ग पर चल कर,
इक बार प्रिये तुम आ जाना,
इक बार प्रिये तुम आ जाना.......

वीणा के तारों ने मधुरिम,
सरगम का श्रृंगार किया।
सप्तक कि स्वर लहरी ने,

पावन पुँजित उपहार दिया।

अभ्युदय सेअस्तांचल तक,
अभिगम से उपरान्ह तलक।
झनकार छिडे जो तारों मे,
सौंदर्य बिखेरे जमी फलक।।

दग्धांतक का आतप हो,
स्वर्गिक सुख की अभिलाषा।
प्रणय गान या प्रलय गीत,
उर कि प्रीति कि परिभाषा।।

संगीत महालय गीतों का,
अनुपम सौंदर्य बरसता है।
झंकृत तारों की वीणा का,
मृदु शोर मधुरिम बजता है।।



सौन्दर्य 
🔏🔏🔏🔏

सौ
न्दर्य का अलग ही है आकलन
इसमें नहीं होता कोई आवरण। 

जब दो शब्द मधुर बोल दो
प्रेम के सुर इसमें घोल दो
अलंकारों का श्रंगार हो
मृदु भावों का उदगार हो। 

लावण्य का सम्मान हो
सुन्दर सा परिधान हो
खुशी भरी मुस्कान हो
गौरवमयी एक शान हो। 

चन्द्रमा सी शीतल 
महका दे पल पल
आनन्द उमड़े छल छल
स्वागत करे हो निश्छल। 

शारीरिक सौन्दर्य नहीं है पूर्ण
यह सुन्दर कहानी है अपूर्ण
चन्द्रमा में भी जब सोलह कलायें मिलती
तब ही पूर्णिमा से वह होता पूर्ण।



कोई स्वपन संजोने लगता है,,
----------------------------------^^^
कूँ -कूँ करती कोयल की,

जब गीत सुहानी लगती है,,,
मीठी-मीठी स्वर कोई,
जब जानी-पहचानी लगती है,
जब प्रेम कापोलें भरतें है,
जब मन मे कलरव होता है,,,

तब एकाकी मन मेरा,
कोई स्वपन सजोने लगता है,,,,,,,,

जब पीली-पीली सरसों से,
धरती की शोभा बढ़ जाती है,,,
जब कोई कुमुदनी- भ्रमर के,,
प्रेम में पड़ जाती है,,
जब कलसी लेकर अलसी,,
अपने पर इतराती है,,,
जब गेहूं के खेतों में,,
पवन जरा थम जाती है,,
जब टप -टप महुवा गिरती है,
जब आम हरे रंग लाती है,,
जब मीठे-मीठे नीदों में,,
जग सारा सोने लगता है,,,,,,,

तब एकाकी मन मेरा ,
कोई स्वपन सजोने लगता है,,,,,,,

जब मधुप कोई मधु के लालच में,,
अपनी आहें भरता है,,
जब कोई चकोरा चंदा को,
तिरछे नजरों से तकता है,,
जब कोई चतुर चपला,,
नयनो के बाण चलाती है,,
जब गुथी हुई केश -बेणी,
जुड़े से खुल जाती है,,,
जब नवयौना अपना कोई,,,
आँचल गिरा लजाती है,,
जब चंचल मन मेरा,
आपा खोने लगता है,,,

तब एकाकी मन मेरा
कोई स्वपन सजोने लगता है,,,,

(राकेश पाण्डेय)


 नारी हैं सौंदर्य की प्रतिमा 
कभी बेटी बहू तो कभी माँ .


नारी हर रूप में पूज्नीय सौंदर्य की मूर्ति हैं 
कभी बेटी बनकर सबको लाड़ लड़ाती हैं 
कभी बहू बनकर गृह लक्ष्मी कहलाती हैं 

कभी जीवन संगनी बनकर हर मोड़ पर 
अपने जीवन साथी का साथ निभाती हैं .

कभी माँ बनकर ममता लुटाती हैं 
नारी का रूप सौंदर्य से परिपूर्ण हैं 
सोलह श्रृंगार से सजकर नारी 
के सौंदर्य में चार चाँद लग जाते 
हैं .

क्योंकि नारी का जीवन ही सौंदर्य त्याग 
बलिदान आत्मविश्वास और सम्पर्ण हैं .
# रीता बिष्ट


" सौंदर्य'

उषा किरण जब जलज पर बरसे, 

मंद मंद तब वे मुस्काये।
भौरों का गुंजन जब बगीया मे
अलसायी कली को जगाये
तब प्रकृति का अनुपम सौंदर्य
निखर निखर जाये।
रंग बिरंगी तितलियां जब फूलों के
इर्दगिर्द मडराये।
आमो मे मजंर जब बगिया मे आये
तब कोयल की कूहू कूहू मन मे भाव जगाये
तब प्रकृति का सौंदर्य निखर निखर जाये।
चाँदनी रात में सागर की लहरें
जब उठते गिरते मचल मचल जाये
तब चाँद इठलाये अपनी सौंदर्य पर।
तब प्रकृति का अनुपम सौंदर्य निखर निखर जाये।
मंदिरों में दीपक की माला
भक्तों के मन मे ग्यान जगाये
और जब नारी माँ बन जाये
उनका सौंदर्य निखर निखर जाये।

 💐भावों के मोती💐
2-5-2018
सौंदर्य
*
**********************
चंचल रात्रि चंद्र की सहदायिनी 
जगमग सितारों की ओढ़नी ओढ़े
सौंदर्य के अंतिम श्रृंगार पर
बहक रही थी, मुस्कुरा रही थी।
रात्रि चंद्र, तारों को
आग़ोश में लेकर
मेनका को जला रही थी।
न जानें रात्रि ने स्व श्रृंगार पर
कितनों को दीवाना बना दिया
खुद अंधेरे में रह कर
जुगनू को परवाना बना दिया।
सोलह कलाएं भी
इस सौंदर्य पर बलिहारी है।
पूनम की रात्रि
बिंदी,चूड़ी,टीके,गजरे की महक पे भारी है।
कामिनी के हुस्न औ शबाब को
पूछता अब कौन है...
रात्रि कला के सौंदर्य पर
स्वयं अप्सराएँ भी बलिहारी है।

वीणा शर्मा


जब स्वप्न की खूबसूरती 
यथार्थ से मिली
स्पंदन सहित ह्रदय में 

ज्योत्सना थी कहीं 
स्वप्न की खूबसूरती 
मुस्कुराई 
थोड़ी सकुचाई 
अपने सौंदर्य पर इठलाई
और लगी फरमाने 
यथार्थ दोस्ती कर लो मुझसे 
मुझ में डूबकर
भूल जाओ दुख अपने 
देखो मुझ में डूबकर 
सब भूल जाते हैं शिकवे 
भूलकर गम सारे 
खुश हो जाते हैं कितने 
अपनी मुफलिसी कर मेरे हवाले 
खो जाते हैं मुझ में मदहोश हो सारे 
यथार्थ था शांत 
देखता रहा 
स्वप्न की खूबसूरती के फसाने सुनता रहा
बाद में यथार्थ मुस्कुराया 
आंखों में झांककर 
फरमाया 
यह सौंदर्य तो है 
पानी का बुलबुला 
जो होता है 
क्षणभंगुर सा
तुम्हीं में खोकर
इंसान छलावों को ढूंढता है 
अतृप्त मन की आकांक्षा 
में ईमान को गिराता है 
क्या तुम्हें अपनी खूबसूरती पर रश्क नहीं आता है?
जो इंसान को इंसानी फर्ज से डिगाता है 
दुनिया के नैसर्गिक सौंदर्य 
में मेरा अस्तित्व ही भूल जाता है

 यदि मैं तुमसे दोस्ती करता तो तुम्हारे हुस्न की महत्ता ना रहती
 इंसान की तकदीर तुम्हारी खूबसूरती में न जकड़ी होती 
लोग झूठी क्षणभंगुरता के पीछे ना भागते 
सदैव मुझसे पनाह मांगते 
जीवन की सच्चाई में 
मेरी छवि पाकर 
अंतःकरण से
तदबीर में जुट जाते

स्वरचित मिलन जैन



*सौंदर्य*
----------
शिशिर की सांझ हूँ

हेमंत की सुबह हूँ मैं
बसंत में खिल खिला कर
पतझड़ में बिखरा जमींदोज 
प्रकृति का मासूम सौंदर्य हूँ

गीत, गज़लों नज्मों में
गुनगुनाता 
छंद ,चौपाई,अलंकारों में
लय सुर ताल बद्ध
अक्षर अक्षर रस में डूबा
अलंकरण हूँ मैं

भोर के आँगन में बिखरा 
सिंदुर में लिपटा आँचल हूँ
संध्या सुंदरी के गुलाबी- श्यामल आँचल में टंके
सितारों में झिलमिलाता
लहराता श्रृंगार हूँ मैं

हाँ सच है ललना हूँ
पर प्रकृति का संपूर्ण
श्रृंगारित सौंदर्य हूँ मैं
चाहे खिला हो चाहे बिखरा।

डा. नीलम 
(अजमेर)


 पूनम का चाँद जब
धरती की गोद उतरता है
भोर साँझ को रवि जब

नभ सिन्दूर भरा करता है
हाँ सौंदर्य दिखता है 

नई नवेली दुल्हन का जब
सोलह श्रृंगार दिखा करता है
मेहँदी में छुपा हुआ जब
प्रीत का प्यार रचा दिखता है 
हाँ सौंदर्य दिखता है 

धरती की गोदी में जब
नव अंकुर खिला करता है
पत्थर में संघर्षरत जब
कहीं फूल भी हँसता है
हाँ सौंदर्य दिखता है 

माँ की करुणा का ज्वार जब
शिशु पे प्रेम बन उमड़ता है
ममता का सागर बन जब
नेह का मेघ बन बरसता है
हाँ सौंदर्य दिखता है 

ऋतुराज दवे

Tuesday, May 1

गाँव-1 मई 2018


आओ ! मेरे गाँव चलो ,
गाँव का जीवन बताता हूँ ।
हरी-भरी पहाड़ियों के बीच ,

बहुत ही सुकून पाता हूँ ।।

सुबह सवेरे जल्दी उठकर ,
खेतों की सैर कर आता हूँ ।
कुँए के नीर से नहाकर ,
आनंदमय हो जाता हूँ ।।

गाँव की पुरानी बावड़ी से ,
ठंडा जल ले आता हूँ ।
कच्ची सड़को के ऊपर ,
सरपट दौड़ लगाता हूँ ।।

दिन को भरी धुप में ,
नीम की छांव में सो जाता हूँ ।
शाम को बड़े बुजुर्गों संग ,
चाय की चुस्की लगाता हूँ ।।

मेहनत करके पेट भरते ,
इज्जत की रोटी खाता हूँ ।
गाँव की छोटी सी कुटिया में ,
जीवन बसर कर जाता हूँ ।।

गाँव के सब लोगो से ,
प्रेम का रिश्ता निभाता हूँ ।
गाँव लगता " कवि जसवंत " को प्यारा ,
गाँव की महिमा गाता हूँ ।।



मुझे याद बहुत आता है,
मेरा हरा भरा हरियाला,
प्यारा प्यारा सा गाँव।

खुशियों से भरा ,
पूरा एक परिवार,
सुख दुख का आधार।
ये शहर बड़ा अन्जाना है।
सब अजनबी से लगते।
ये लम्बी चौड़ी सड़कें,
रातों मे भयावह सन्नाटा।
ना सुनता यहाँ कोई,
निर्भया की चीख पुकार।
ये शहर बड़ा बेगाना है।
आलीशान कोठियां,
ऊँचे ऊँचे मकान,
हरे भरे पेड़ों का,
नहीं कोई नामोनिशान।
भू तल का जल 
सब सूख गया हाय!
पशु पक्षी इन्सान,
प्यास से हुए बेचैन।
ये शहर बड़ा वीराना है।
चकाचौंध कृत्रिमता,
मानव मे छिपी है पशुता।
बाह्य आडम्बर और दिखावा,
प्यार में भी होता छलावा।
दूधिया रौशनी में नहाया,
इस शहर मे बड़ा अँधेरा है।

©प्रीति


 वो भोर की बेला
पंछियों का मेला
सौंधी सी खुशबू

करे दे बेकाबू

लहलहाती फसले
मन को जैसे छूलें
खेतों की मैंढ़े
सुधबुध मेरी खो दें

रहट की आवाज़
और हंसी ठिठोली
वो पोखर का पानी
और बच्चों की मस्ती

वो खरबूज मतीरे
और ऊंटों के गाड़े
वो मेले की रौनक
और पनघट के नज़ारे

वो केरी का पना
और चूल्हे की रोटी
वो दादी का प्यार
और दादा की झिड़की

मेरे गांव की यादें
पुरानी हो गई है
एक अरसे से लिखी
कहानी हो गई है

स्वरचित मिलन जैन


**"गांव"**की याद
****"""****

बचपन का गांव
भोर की चौल
रंभाती संझा
स्वेदसने अहसास
ठहाके , कराहें
ईख की मिठास
सरसों की सुवास
फागुन, सावन
चटक,चहक
पनघट-पनिहारिन
अवगुंठन से झांकती
नथनी, बेसर
पेड़ों तले चौपाल
साझा-चूल्हा
रोटी गुड का स्वाद
नहीं है महक
सोंधी-सोंधी
नानी के हाथ की
पनैथी रोटी
कहां हैं वो,
आदि अनुच्छेद
इक परिच्छेद।

रंजना सिन्हा सैराहा...


हकीकत नही तो ख्वाबों में मन समझाते हैं
ख्वाबों में हम रोज गाँव घूम आते हैं ।।


वही आँगन वही चबूतरा हमें बहुत लुभाते हैं
वही नीम का पेड़ बरगद की छाँव पास बैठाते हैं ।।

हम भले ही अपने शहरीपन पर इतराते हैं
पर गाँव के भोले लोग वैसे ही हाथ मिलाते हैं

वो तालाब वो नदी के किनारे आज भी भाते हैं
थोड़ी देर को मानो हम बचपन में खो जाते हैं ।।

क्या कहें इस तरक्की को ''शिवम"समझ न पाते हैं
हो रहे शहरीकरण बडी बिचित्र स्थिति दर्शाते हैं ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"


 गाँव
(1)
दौडता, व्यस्त

गाँव जीवन देख
ठिठका वक्त
(2)
गाँव में जल्दी
रवि को सुलाकर
रजनी आई
(3)
गाँव की छाँव
मन को सुकून भी
खुल के साँस
(4)
प्रेम का फेरा
गाँव बैठा आँगन 
शाँति का डेरा
(5)
सबको पूछे
गाँव चौपाल बैठ
हुक्के को फूँके
(6)
हँसे लाईट
गाँव की सडक पे
छेडते गड्ढे
(7)
गाँव के खेत
श्रम करे बुवाई 
उगता धन
(8)
पक्षी चहके
मिट्टी एवं शुद्ध घी 
गाँव महके
(9)
गोधूलि वेला
घंटिया बजी गाँव
गायों का रेला
10
खेलें गोपाल
गाँव के चबूतरे
बैठे चौपाल



सभी कलमकारो को प्यार भरा 
आदाब 
मेरे गाँव की तस्वीर दिखा रहा हू


देखते ही देखते बहुत बडा हो गया मेरा गांव 
बैठने को नही मिलती इमली वो पीपल की छाॅव।

जिधर देखो उधर इमरतो का मुजस्मा बन गया
झोपडी थी जहां वही बहुमंजिला भवन तन गया,
वो ठुठ भी नही रहा जिस पर कौवे करते थे कांव कांव।

पुछते नये वाशिन्दे तुम रहते कहां पुरानो से,
वे खुद पर शर्मिन्दा है जो रहते यहां जमानो से,
नये नये लोगो ने आकर जमा लिये यहां पांव।

नये नये चैहरो से बदल रही है पिढीयां,
चढता ही जा रहा हे ये नित तरक्की की सिढीयां,
स्कूल से कालेज तक अब हो गया फैलाव।

बिडी यहां की लंगर मशहुर देश मे,
बेटे डटे है सरहद पर फौजी के भेश मे,
देखो गांव का मेरे कितना है वतन से लगाव।

हामिद को ये चिंता हरदम ही सताती है,
इसकी तरक्की के आगे हरदम राजनिती ही आती है,
सोच मे नेतागण की जाने कब होगा बदलाव।

दखते ही देखते बहुत बड़ा हो गया मेरा गांव

हामिद सन्दलपुरी की कलम से



 जहाँ स्वर्ग है,
अवतरित।
जहाँ धरा है,

हरित।।
जहाँ ममता की,
छाँव है....
जहाँ प्रखर,
प्रपात है।
जहाँ मनोरम,
प्रभात है।।

ओ मेरा गांव है.....

जहाँ जीवन,
वरदान है।
जहाँ गोरस की,
खान है।।
जहाँ वर्षा कि पानी में,
कागज की नाव है....

ओ मेरा गांव है.....

जहाँ गीतों की,
गुनगुन।
जहाँ पायल की,
रुनझुन।।
संगीतों के धुनपर,
थिरकते जहाँ पाँव है...
ओ मेरा गावँ है....

जहाँ नैना है,
मधुशाला।
यौवन है,
मतवाला।।
जहाँ नैनन जुड़ाव है...
ओ मेरा गाँव है.....

जहाँ बूढ़ों का,
ज्ञान है।
जहाँ जीवन,
वरदान है।।

जहाँ मनोहर पहीनाव है,,,
ओ मेरा गाँव है....

(राकेश)



 नमन मंच
"गांव'


वह गांवो का मेला, वह गांवो का ठेला।
कितना याद आता है मुझे वह गांवों का मेला।
वह आम के बगीया मे कोयल का कूकना।
वह सरसों के फूलों से खेतो का सजना
कितना याद आ ता है मुझे वह गावं का कोना
वह कठपुतली का नाच वह बाइसकोप का सिनेमा।
कितना याद आता है मुझे
वह गांवो का सिनेमा।
वह पेड़ के झुरमुट मे गुरु जी का पढ़ाना
वह पहाड़ा वह गिनती का रटा मारना।
वह गुरु जी के डंडे से बच्चों का भागना
कितना याद आता है मुझे वह गांव का कोना।
वह लूका -छिपी खेलना, वह डंडा से गिल्ली का मारना
कितना याद आता है वह गांवो का खेलना।
वह मिट्टी की सोधीं महक,वह बारिश की फुआर
वह चारपाई पर बैठ कर खाना खिलाना।
वह मक्के की भूजा, वह चना चबेना
कितना याद आता है वह गांव का भूजा।

भा.3*1/5/2018मंगलवार, शीर्षकः गांव ः
मेरे भारत के गांवों की महिमा अपरंम्पार।
जिनकी माटी से है मेरा सोने सा संसार।

इनमें रहने से हीे जीवन में उजयारा आऐ,
गांवों की झोली से मिलते सबको उपहार।

इनकी रजकण में रहते हैं चंदन और अबीर।
इनके कणकण से ही उपजे धीर वीर गंभीर।
अनाज गांवों में उपजाऐं कृषक जो हमखाते,
ये अन्न धान्य को खाकर विकसित हुए शरीर।

कलरव पक्षी करते चिडियाँ रोज चहकतीं।
मयूर यहां नृत्य करते गौरैयाँ खूब फुदकतीं।
मनोबाँछित वातावरण इन गांवों में मिलता,
गांव गांव चौपालें लगें बगियाँ खूब महकती।

कृषक सृजन करते सब अच्छा नेह बरसता।
गेहूँ चना उपजता जब गांव मधु मेह बरसता।
वैरभाव नहीं दिखता जैसाऔर कहीं है देखा,
गांव गांव मिलजुल रहते खूब स्नेह बरसता।
स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
शुभसंध्या, जय जय श्री राम राम जी।

नेता-30अप्रैल 2018



 ''नेता" 

जो समेटता है सबको वो गंदा हो जाता है

नेता के संग भी कुछ ऐसा धंधा हो जाता है ।।

क्या भला क्या बुरा सभी का चंदा हो जाता है
मजबूरी में ही बेचारा नेता अंधा हो जाता है ।।

सबका साथ निभाना कितना टेड़ा है
गंगा कितनी निर्मल उसके संग बखेड़ा है ।।

चंदन की जो बात करे वो चाँद पर है 
दिलों के जज्बात भरे वो चाँद पर है ।।

धरती पर रहना है धरती की बात करो 
नेता संग फिजूल न ''शिवम्"फसाद करो ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"




 देश की रक्षा करना है तो,
नवयुवकों तुम आगे आओ।
देश के सच्चे सेवक बन,

नेतागिरी को दूर करो।
नेताओं की पार्टीबन्दी,
गुटबन्दी और भ्रष्टाचार,
इन खतरों को दूर करो।
देश की सच्ची सेवा कर ,
देश को तुम मजबूत करो।
नेताओं के स्वार्थसिद्धि,
आपसी फूट मतभेदों से,
देश खोखला हुआ जा रहा।
दुश्मनों की आँख लगी है,
देश पर कब्ज़ा करने को।
नेताओं की दाल न गले,
तुम ऐसी सुन्दर नीति गढ़ो।
उनके झाँसे मे आ कर,
दंगा फसाद,हड़ताल न करो।
लालबहादुर औ राजेन्द्र प्रसाद से,
कर्मठ नेताओं की सुदृढ सेना,
तुम सब मिल कर तैयार करो।
देश की रक्षा करना है तो,
नवयुवकों तुम आगे आओ।
देश के सच्चे सेवक बन,
नेतागिरी को दूर करो।
©प्रीति

✍🏻 आजकल के नेताजी ...
"""""""""""""""""""""""""""""""""
कवि जसवंत लाल खटीक
###############
💐काव्य गोष्ठी मंच💐 
कांकरोली , राजसमन्द

आजकल के नेताजी,
सफेद कुर्ता ,सफेद टोपी ,
सफेद गाडी ।
फिर भी ,
काला दिल होता इनका ।।

देश को खा रहे नेताजी ,
जैसे दीमक लकड़ी खाते ।
फिर भी इनकी हिम्मत देखो ,
देशभक्ति का तिलक लगाते ।।

झूठ बोलना काम इनका ,
सच का कभी नाम नही लेते ।
काम एक भी नही करवाते ,
आश्वासन ये हर रोज देते ।।

आठ जमात पढ़े नेताजी ,
चौदहवी पढे को समझाते है ।
बजट पास नही हुआ कहते ।
फिर ,
घर, कार और जमीन ,
कहाँ से लाते है ।।

फाइले भेज दी आगे ,
पास पता नही कब होगी ।
आस लगाये बैठी जनता ,
मांगे पूरी सबकी होगी ।।

जनता को तरसाते हुए ,
चार साल खूब कमाते ।
चुनावी साल में नेताजी ,
थोडा सा धन बरसाते ।।

भोली- भाली जनता इनके ,
बहकावे में आ जाती है ।
मीठी बोली, हाथ जोड़ने पर ,
वोट इनको दे जाती है ।।

काश " कवि जसवंत " नेता होता ,
देश से भ्रष्टाचार जरूर मिटाता ।
स्वच्छ राजनीति अपना कर ,
गन्दी राजनीति जड़ से मिटाता ।।




नेता
चारों तरफ चुनावी माहौल देख तबीयत हो गई नर्म 
नेताओं के बारे में की गई तारीफें सुनकर रह गए हम दंग 

कुर्सी कुर्सी कुर्सी का ये आलम सत्तालोलुपता इसका है कारण 
ये सत्तालोलुपी नेता 
वादों के समंदर में नहाते हैं 
परंतु आश्चर्य 
सूखे ही निकल आते हैं 

चुनावी माहौल में यह नेता 
दरिद्र हो जाते हैं 
वोटों के लालच में 
भिखारी तक बन जाते हैं 

अर्जुन ही अर्जुन
दिखाई दे रहे हैं 
जो मछली के रूप में 
कुर्सी को देख रहे हैं 

कुर्सी के स्वयंवर में 
भाग लेने ये आए
दुशासन दुर्योधन है पहने 
अर्जुन का चोगा 

इन बहरूपिया से 
रहना है सावधान 
कब ये अपना 
बदलदें परिधान 

कुर्सी का चीरहरण 
करेगा जो दुशासन
तो कैसे बचाएगें 
इसको नारायण

कंसों की दुनिया में 
कृष्ण का कहां है काम 
आज तो कंस ही है 
कृष्ण की पहचान 

समझ है हमारी कि
हम कृष्ण को पहचाने 
और उसी को हम 
कुर्सी पर बैठा दें 

देश को खुशहाल 
समृद्ध बनाकर 
आसमां पर चमकता
ध्रुव बना दे

स्वरचित मिलन जैन



ाथ जोड़कर कहे ये जनता, विनती सुन लो नेता जी 
पाप कर गए तुम्हे जिता कर, काम तो कर लो नेता जी 

खूब कमाओ खूब उडाओ ,लेकिन इतना ध्यान रहे 
कमा कमा के मर गयी जनता ,कितने कर सिर लाद दिए
हो हर थाली में दाल भात , कुछ कृपा कर लो नेता जी 
विनती सुन लो नेता जी 

कुछ नही तुमसे और मांगते, रोशन सारी गलियां हो
घर घर हो विद्या उजियारा, बाग में खिलती कलियां हो
चिड़िया खुलके उड़े गगन में, गिद्धों को धर लो नेता जी 
विनती सुन लो नेता जी 

अपनी किस्मत तुम्हे सौंप दी, जनता का विश्वास हो तुम 
आत्मा की आवाज पे चलना, सबसे बढकर आस हो तुम 
तुम्हे कसम है मातृभूमि की, तौबा कर लो नेता जी
विनती सुन लो नेता जी 

सपना सक्सेना 
ग्रेटर नोएडा

"अंदाज"05मई2020

ब्लॉग की रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं बिना लेखक की स्वीकृति के रचना को कहीं भी साझा नही करें   ब्लॉग संख्या :-727 Hari S...