Thursday, April 26

तन्हाई -26अप्रैल 2018




मुहब्बत नाम है तन्हाई में तन्हा सुलगने का
अजब खेल है तकदीर के बनने बिगड़ने का


कहां कब जान पाया हूँ मिजाजे़ हुस्न मै तेरा
बहाना ढूंढ के मिलना कभी मौका झगड़ने का

करोगे इश्क तो जानोगे तुम जलवे मुहब्बत के
मजा खूब है महबूब से मिलने को तड़पने का

ये दुनिया देखती है तजरबो को हिकारत से
सफर एक शै का है ये कली से फूल बनने का

मुहब्बत एक नेमत है मेहरबानी है कुदरत की
यही एक दौर है सोहल पत्थर के पिघलने का

विपिन सोहल 

 तन्हाई- 

चाँद टकटकी देख रहा मैं, इंतजार कराया करती हूं!

आंख मिचौली सी करती, हर रात सजाया करती हूं।

तिरछी चितवन से तारों की,तङपन निहारा करती हूं
तन्हाई का इक इक क्षण ,चितचोर सजाया करती हूं
मेरी आरोही सांसो में ,यादों का गीत सजा कर के,
मुखरीत मन से ही अंतर्तम, संगीत सजाया करती हूं।
चाँद टकटकी देख रहा मैं, इंतजार कराया करती हूं!

थाम उजाले का दामन, सुख स्वप्न सजाया करती हूं,
हंसी ठिठोली सुख की हो, कुछ स्वांग रचाया करती हूं,
अमृत के फीके प्याले जब, जीवन में सांसे ना भरे
आशाओ की मदिरा का, रसपान कराया करती हूं।
चाँद टकटकी देख रहा मैं, इंतजार कराया करती हूं!

स्पन्दीत धङकन पे बारिश का ,मोर नचाया करती हूं
बंधी अधूरी परिभाषा ,खिलती भोर सजाया करती हूं
धूप संग मेरी परछाई, यूं चलते चलते कभी ना थके
तुझ संग मेरे मीत, प्रीत की ये, डोर बंधाया करती हूं
चाँद टकटकी देख रहा मैं, इंतजार कराया करती हूं!

------ डा. निशा माथुर/8952874359 (whatsapp)

 तन्हाईयाँ
मेरी परम सखी है जग में ,
मेरी भोली -सी तन्हाईयाँ ।

चाहे जितनी बातें करलें हम,
चाहे रोयें और हँस लें चाहे ।
न वे थकतीं मेरी बातों से ही,
न डर ही होता है चुगली का।
समय की पाबन्दी का रोनाही,
चुप चुप सारा ही सुन लेती है।
वैसे तो दुनिया में बड़े लोग है,
पर इकदूजे के हित वख्त नहीं है।
भीड़ भरी दिखती हर चौराहे,
सड़क भी न दिखती खाली है।
बस व रेल में धक्का मुक्की ,
लगती दुनिया बहुत बड़ी है।
घरआने पर मिलता न कोई,
पड़ोसी भी न पहचानता है।
घर के अन्दर बस चार जने,
हम दो और हमारे दो बच्चे।
चारों चार मोबाइल उनके है,
इकदूजे के लिएभी वक्त नही।
ऐसे में बस बाते करते रहते है,
मै और मेरी भोली तन्हाईयाँ ।
डॉ. सरला सिंह।




गज़ल 

उनकी तन्हाई भी दिल को भाती है

जीने का जज्बा सदा जगाती है ।।

आज नही तो कल उनसे मिलना होगा
भले अभी मुरझाये कल खिलना होगा ।।

उनके गम की भी तासीर निराली है
अलग तरन्नुम रहती जैसे दीवाली है ।।

तन से दूर भले पर मन से न दूर हैं
दिल में उनकी चाहत के सुरूर हैं ।।

काश अगर वो दिल में न आये होते
गीत प्यार के कैसे हमने गाये होते ।।

ये भी खुदा की नेमत है समझो ''शिवम"
जिनको याद करके भूलें सारे गम ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"

अरमानों की धूप में
सिकुडती परछाई है 
उलझी हुई जिन्दगी से 

बेहतर तन्हाई है 

मानो तो सोना 
ना मानो तो पीतल
रिश्तों के बाजार में
छाई महंगाई है
उलझी हुई जिन्दगी से
बेहतर तन्हाई है

मैं कमाने निकलती हूँ रोज़
चंद रिश्ते लोगों की भीड में 
इक मैं की मार ने
रिश्तों की कीमत बढ़ाई है
उलझी हुई जिन्दगी से
बेहतर तन्हाई है

मिलन जैन




भावों के मोती,26/4/2018गुरुवार, शीर्षकः
तन्हाई ः विधा ,मुक्तकःःः

अगर श्री राम साथ हैं अपने,
फिर कहाँ कैसी हमें तन्हाई।
थामा जब दामन हमने इनका,
हमारे पास हैं जी श्री रघुराई।

नहीं सताता हमें डर जमाने का,
नहीं किसी से कोई हमें रूसवाई।
सदा स्वछंद रहेंगे सब जन यहाँ,
हैं कन्हाई साथ फिर कैसे तन्हाई।

ये केवल मतिभ्रम है हम सबका ,
झांककर दिल में देखो जरा भाई।
बैठे हैं हृदय में जब श्यामा तुम्हारे,
बताऐं हमें भी कहाँ कैसी तन्हाई।

गर विश्वास खुद पर जमाने से अधिक,
और साथ में हैं प्यारे प्रियतम रघुराई।
सारी दुनिया देख ली जांच कर हमने,
सबसे भली लगती हमें हमारी तन्हाई।
स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.



नमनमंच
२६-४-२०१८
विषय-तन्हाई

****"""****
वर्ण पिरामिड
तू
भयी
बैरिन
रे तन्हाई!
पिय गमन
बसंत सावन
ये मौसम दुश्मन
****
रंजना सिन्हा सैराहा.


वो तन्हाई भरी वीरान रातें,
मुझको याद आती हैं,
माँ तेरी ममता से भरी बातें।

वो गोदी मे सिर रख कर,
प्यार से बालों मे उँगली फेरना।
जब भी परेशांँ हुई,
आशाओं और दिलासाओं की,
बौछार करना।
आँखों में नींद की जगह,
तेरी सूरत विश्राम लेती है।
वो तन्हाई भरी वीरान रातें,
मुझको याद आती हैं,
माँ तेरी खुशियों से भरी बातें।
मेरे चेहरे पे उदासी का आना,
और वो तेरा ठहाकों का ताना बाना।
मेरे गम को अपने अन्दर ,
धीरे से समेटना।
मन ही मन रोना,
और बाहर से हँसना हँसाना।
वो तन्हाई भरी वीरान रातें,
मुझको याद आता है,
माँ वो तेरी अचानक से,
हम सबको छोड़ कर,
चले जाना ।
©प्रीति..

 *तन्हाई*
--------------
जिंदगी के शीश महल में

कितने रिश्ते बांधे थे
कतनी ख्वाहिश, कितने सपने,
कितनी चाहत पाली थी

इक दिन पीर परिंदा आया
ले उड़ सब साथ गया
दिल की नगरी सूनी करके
तन्हाई से घर भर गया

सूनी नगरी सूने कमरे
हर आहट सन्नाटा है
तन्हाई के आलम में
अब कोई न आता जाता है 

शीश महल का हर शीशा
धुंआ धुंआ हो रहा
गम में डूबा सारा आलम
रुंआ रुंआ हो रहा ।

डा. नीलम (अजमेर)

Wednesday, April 25

सेना -25अप्रैल 2018







हमारी सेना ज़िन्दाबाद


हम सोकर बिताते हैं रैना
पर जागी रहती है सेना। 

जब कहीं आ जाती बाढ़
होने लगता सब उजाड़
जब अनुशासन सीमा भंग होती
आतंकी प्रवृति उद्दण्ड होती
जब युद्ध के बादल छाते हैं
रण पिशाच मण्डराते हैं
जब प्राकृतिक आपदा होती है
सब्र अपना माद्दा खोती है
जब देश सम्मान की बात आती 
तब जिव्हा एक ही गान गाती। 

हमारा हर योद्धा ही हीरा है
इसने हर बाधा को चीरा है
सागर लहरों को झेला है
शत्रुओं को दूर तक ठेला है
पर्वतों की ऊंचाई नापी है
शत्रु की रुह भी कांपी है
बर्फीली घाटियों को इन्होंने चूमा है
इनके शौर्य से चप्पा चप्पा झूमा है
इनके सहारे देश सुरक्षित है
इनकी बाहों में अभिरक्षित है। 

सेना हमारी वह पूंजी 
जिसकी ललकार आकाश तक गूंजी।

----"सेना"----

सेना के जांबाज सिपाही,

राम भक्त हनुमान हैं।
ये अंगद नल-नील जामवंत,
मेरे भारत की शान हैं।

पलभर में ये सिंधु लांघ दें,
पल में पर्वतराज नाप लें।
संकटमोचक बने देश के,
ये भारत के वीर महान हैं।

दुष्टों को ये धूल चटावें,
भारत का परचम लहरावें।
अमन-चैन के हैं रखवाले,
मेरे भारत की जान हैं।

द्वापर के अर्जुन हैं इनमें,
कालजयी हैं देखो रण में।
त्रिशूल पिनाका है सेना में,
चन्द्रहास खड्ग सा भान हैं।

ना कोई है रंगे मज़हब,
देश सेवा व्रत महान है।
सबसे ऊँचा रहे तिरंगा,
इस पर जान कुर्बान है।

भूपेन्द्र डोंगरियाल
25/04/2018



🌻भावों के मोती 🌻
25-4-2018
सेना 
*
****†****
मैं भारत की शान हूँ
सेना बड़ी बलवान हूँ
जो देखे बुरी नजर से
उसकी मैं अंतिम श्वास हूँ।

जननी छाया में पला पढ़ा
अब देश की खातिर जीना है
जीवन एक मिला मुझको
उसे विस्मरणीय करना है।

जन्मदात्री के बदले अब
लाखों माओं का लाल हूँ
शत शत नमन करूँ तुझको
तेरा मैं अभिमान हूँ।

न मौसम देखा न तन देखा
लक्ष्य मेरा प्रतिलक्षित है
भारत की सीमा रेखा पर
दृष्टि मेरी अर्जुन सी है।

ईद,दिवाली ,होली,मेला
गोली की धुन पर होती है
ढोल,नगाड़े लगते अब
जीवन की एक पहेली है।

यही मेरी हरियाली है
यही जीवन की काशी है
मैं भारत की शान बना
यही मेरी हमजोली है।

अंत समय मे ,मैं सैनिक
लौट तिरंगे में आऊं
अपने भारत की शान में
रक्त रंगोली बना जाऊँ।

वीणा शर्मा,पंचकूला





Tuesday, April 24

आजादी -24अप्रैल 2018





आजादी किसे न भाती ये सबको लुभाती है 
मगर ये आजादी हमको एक दिन गिराती है ।।

जब से श्रष्टि शुरू हुई ये दास्ता बताती है
आदिमानव मानव में फर्क यही कराती है ।।

अनुशासन की पट्टी पढ़ सभ्यता निकट आती है
बच्चों की आजादी ठीक न कही जाती है ।।

औरत की आजादी भी गलत कहलाती है
आजादी की तस्वीर आज साफ नजर आती है।।

अदब जैसे गायब है तहजीब गोता खाती है
आगे की तस्वीर ''शिवम" बहुत ही डराती है ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"


नमन
विषय-आजादी
******"

हाइकु

आजादी ओज
देशभक्ति का जोश
तिरंगा केतु

रण चमन
आजाद हिंदुस्तान
वीर अमन

सुंदर स्वप्न
आजाद हुआ हिंद
मुक्त गगन

नेता ने ठूंसा
आजादी पकवान
दीनो का स्वप्न

तिरंगा दर्ज
आजादी लें आकार
हिंद का फर्ज
****
रंजना सिन्हा सैराहा...




सभी कलम के सिपाहीयो को आदाब
एक राष्टीय गीत पेश है।
खिजा चमन की बहार को मिटा नही पाई

बयार वतन परस्त शमा को बुझा नही पाई। 

आजादी को ढुढंने निकले,
हम बच्चे हिन्दुस्तानी।
खो गई गुम हो गई है,
हिन्द मे हिन्द की रानी।
हर तरफ ही शौर मचा है,
वोटो का सब खेल रचा है।
मारो काटो बचो बचाओ,
देश की बिगढी रूहानी।
आजादी को ढुढंने ,,,,,,,
साम्प्रदायिकता की आग लगाई,
मजहबी ऑधी खुब चलाई।
नेता जी आरक्षण को लेकर,
और लाये काबेरी का पानी।
आजादी को ढुढंने,,,,,,?
आजादी को हुये साल सत्तर,
अब भी नारी की हालत है बत्तर।
जुल्म और अत्याचार सहने मे,
नारी का नही कोई सानी।
आजादी को ढुढंने नि,,,,,,
चरित्र हमारा था कभीअच्छा,
देश पे मरता था हर बच्चा।
अब मंहगाई व भष्ट चलन से
कैसी पिघल रही है जवानी ।
आदादी को ढुंढने ,,,,, ऐसा फिर विश्वास जगाये,
फिर हम मुल्क मे अमन बढाऐ।
वतन की अस्मत के खातिर,
देनी होगी कई कुर्बानी ।
खो गई गुम हो गई
हिन्द मे हिन्द की रानी

हामिद सन्दलपुरी की कलम से


 गोधूली बेला मे,
सहसा एक मिट्ठू,
गिरा मेरे बागीचे मे।

तन रक्त से सना,
मन सहमा सहमा,
लगता था।
किसी निर्मम ने शायद,
भरपूर शक्ति आजमायी थी.
कुछ क्रोधित, कुछ विवह्ल मन से,
आँचल में ले आयी।
प्रथम चिकित्सा कर,
जल की कुछ बूंदें मुख में जो डाला,
मिट्ठू कुछ चैतन्य हुआ।
बच्चों ने देखा नन्हा साथी,
खुशी खुशी पिजरा ले आये।
बडे जतन से मिट्ठू की सेवा,
हम चारों ने मिल कर की।
तन मन को मान सुरक्षित,
खुशी खुशी वो पिजरे मे,रहता।
तरह तरह के करतब करता,
सबका मन बहलाता ।
जैसे जैसे बडा हुआ वो,
पिजरा सकरा होता गया।
दुनिया से लडऩे की ताकत ,
जब उसमे आई,सोचा करता,
उस निर्मम को सबक सिखाने,
कब मैं बाहर निकलूँ।
धीरे धीरे घर के अन्दर, 
उसको उडना सिखलाया।
निर्मम जग से टक्कर लेने का,
गुर उसको सिखलाया।
स्वयं सुरक्षा का आश्वासन देकर,
सबल पंख पसारे,
आसमान मे ओझल होकर,
दे गया घर मे सूनापन।
घर खाली खाली, मन खाली खाली,
हम चारों ने रखा उस दिन,
अपना पेट भी खाली।
गुमसुम बच्चों के सम्मुख,
मैं अपराधी सी खडी रही।
आँखों मे आँसू भर कर,
बच्चे बोले माँ,
मिट्ठू ठीक तो होगा न !
मिट्ठू को आजादी देकर,
मैं मुक्त हुई अपराधबोध से।
©प्रीति


 आजादी कैसे साकार हुआ है ,
मनमौजी यहां सरकार हुआ है l
जनता शासन नहीं अब जनतंत्र ,

लोकतंत्र वोटो का बाजार हुआ है ll
नेता सब वोटो का खरीददार हुआ है ,
धन बल से ही नेता असरदार हुआ है l
जिसकी बोली सबसे उची बाजार में ,
वही नेता हुआ वही सरदार हुआ है ll
लोकतंत्र में ये सब बारम्बार हुआ है ,
लालच से लोकतंत्र लाचार हुआ है l
जहां - जहां भी मनोनीत गणित हैं ,
वही पर लोकतंत्र तार - तार हुआ है ll

नमन भावो के मोती।
"आजादी'।


आजादी है हमको प्यारी
हम है आजाद देश के नारी।
देश आजाद है ,हम आजाद है
इस आजादी को कायम रखना
प्रत्येक नर नारी का काम है।
इस आजादी को पाने में हमनें
कितने अपनो को खोये है।
आजादी की हवा जब श्वासों
मे घुलती है,हमारी लेखनी स्वतः
ही गीत आजादी की गाती हैं।
आगे आये चाहे कोई चुनौतिया
पीछे हम न पग हटायेगे।
अपने देश की आजादी पर
कभी न आंच आयेंगे।







"अंदाज"05मई2020

ब्लॉग की रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं बिना लेखक की स्वीकृति के रचना को कहीं भी साझा नही करें   ब्लॉग संख्या :-727 Hari S...